बहु के बच्चा नहीं हो रहा तो चलो बाबा के पास, बेटे की नौकरी नहीं लग रही तो चलो बाबा के पास, पति शराब पीता है तो चलो बाबा के पास।

न चेहरे पर कोई तेज..न विचारों में कोई दिव्यता..न सात्विक सदाचारी ब्रह्मचर्य...न सुरीला सत्संग..न योग की शांति..न अध्यात्म की संतुष्टि...फिर भी ऐसे को सुनने लाखों लोग पहुँचते हैं...और उसके चरण की धूल लेने की अफरातफरी में मर भी जाते हैं.

हमारे समाज की बहुसंख्यक औरते समस्या की मूल जड़ को खत्म करने की बजाए, इन बाबाओं के पास जाने के लिए मजबूर है।

ऐसा भी नहीं कि उन्हें पति यह सब करने को कहता है, अधिकांश मामले में खुद पति को भी नहीं पता होता कि उसकी बीवी किसी बाबा की भभूत उसके खाने में मिला रही है ताकि वो शराब छोड़ दे।

वहीं अगर पुरषों की बात करें तो वो इन सब कामों से दूरी बनाकर रखते है। अगर भीड़ में आपको पुरुष दिखेगा भी तो इसलिए क्योंकि वह अपनी मां या बीवी के साथ आया है, या फिर उनके कहने पर।

हाथरस की घटना बताती की हमें फिर से एक बार यह सोचना चाहिए कि हमें भगवान चाहिए या मैसेंजर ऑफ़ गॉड? हमारी महिलायें बाँकियो की तरह अपने निजी कार्य, क्रिएटिविटी नौकरी या व्यापार में busy कब होंगी?

साभार - Jaypanee Singh Rajpoot

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