मर्दानी का संकट और महिला सांसदों के पल्लू में छुपकर षड्यंत्र : उनकी मंशा साफ है—संसद में ऐसा माहौल बनाओ कि हिंसा भड़के। अगर प्रधानमंत्री जरा भी विचलित होते, तो ये लोग उसे 'तानाशाही' का प्रमाण बताकर गृहयुद्ध की घोषणा कर देते। लेकिन वे भूल गए कि सामने वाला खिलाड़ी उनकी इस 'घिनौनी पटकथा' को पहले पन्ने से ही पढ़ चुका है।
यह घटना किसी काल्पनिक देश की नहीं, बल्कि उसी व्यवस्था की है जहाँ कभी तर्कों की तलवारें चलती थीं, लेकिन आज वहाँ कुंठाओं के खंजर लहरा रहे हैं। उस पुरानी पार्टी के गलियारों में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि एक अजीब सी छटपटाहट है। वह छटपटाहट जो तब पैदा होती है जब एक शेर बूढ़ा हो जाए और उसके नाखून गिर जाएं, लेकिन शिकार की हवस कम न हो।
पार्टी के भीतर एक गुप्त बैठक हुई। मर्दों के चेहरे लटके हुए थे। चुनाव दर चुनाव हारने के बाद उनकी मांसपेशियों का वह दम जवाब दे चुका था, जिससे कभी वे सत्ता की कुर्सियां हिलाया करते थे। अब उनमें इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि वे सीधे माथे पर प्रधानमंत्री की आंखों में आंखें डालकर चुनौती दे सकें।
तभी एक "रणनीतिकार" ने धीरे से फुसफुसाया— "जब पौरुष हारने लगे, तो स्त्री को ढाल बना लो।" अगले ही दिन संसद का नजारा बदल गया। जो काम विपक्षी 'मर्दों' को सीना ठोक कर करना चाहिए था, उसके लिए उन्होंने अपनी महिला सांसदों को आगे कर दिया। यह दृश्य किसी भी सभ्य समाज के लिए डूब मरने जैसा था। वे पुरुष नेता, जो बाहर जाकर वीरता के डिंग हांकते हैं, वे संसद के भीतर महिला सांसदों के आंचल के पीछे छिपकर प्रधानमंत्री की कुर्सी को घेरने की योजना बना रहे थे।
प्रधानमंत्री शांत बैठे थे, जैसे हिमालय का कोई शिखर हो जिसे नीचे मच रहे कोलाहल से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन चारों तरफ जो हो रहा था, वह घृणित था। महिला सांसदों को ढाल बनाकर वे पुरुष नेता पीछे से उकसा रहे थे। मंजर ऐसा था मानो वे अपनी जीत की शक्ति खो चुके हैं और अब अपनी महिलाओं के कंधों पर बंदूक रखकर लोकतंत्र के मंदिर को ही लहूलुहान करना चाहते हैं।
"कितनी अजीब विडंबना है कि जो लोग बाहर 'महिला सशक्तिकरण' का झंडा उठाते हैं, वे संसद के भीतर महिलाओं को अपनी कुंठाओं का 'हथियार' बना रहे हैं। यह वीरता नहीं, यह कायरता का वह चरम है जहाँ पुरुष अपनी हार को छिपाने के लिए स्त्री की गरिमा को दांव पर लगा देता है।"
पार्टी के इन 'महारथियों' ने अब एक नया पैंतरा सीखा है। उन्हें पता है कि वे विकास की बहस में नहीं जीत सकते, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें 'कुटा' जाए। वे चाहते हैं कि मार्शल उन्हें उठाकर बाहर फेंकें, उन पर हल्का बल प्रयोग हो, ताकि वे बाहर जाकर दुनिया को अपना 'विक्टिम कार्ड' दिखा सकें। वे चाहते हैं कि देश की गलियों में आग लगे, ताकि वे उस आग पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंक सकें।
आज जब ये नेता घर जाकर आईने में अपनी शक्ल देखेंगे, तो शायद उन्हें खुद से ही घिन आएगी। वह आईना उनसे पूछेगा— "क्या तुम्हारी राजनीति इतनी गिर गई है कि अब तुम्हें लड़ने के लिए महिला सांसदों के पीछे छिपना पड़ रहा है?" यह लेख उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो सत्ता की भूख में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें अब मां, बहन और मर्यादा के बीच का अंतर भी दिखाई नहीं देता।
#politics #BJP4IND #Congress #bihar #bengali #kolkata
यह घटना किसी काल्पनिक देश की नहीं, बल्कि उसी व्यवस्था की है जहाँ कभी तर्कों की तलवारें चलती थीं, लेकिन आज वहाँ कुंठाओं के खंजर लहरा रहे हैं। उस पुरानी पार्टी के गलियारों में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि एक अजीब सी छटपटाहट है। वह छटपटाहट जो तब पैदा होती है जब एक शेर बूढ़ा हो जाए और उसके नाखून गिर जाएं, लेकिन शिकार की हवस कम न हो।
पार्टी के भीतर एक गुप्त बैठक हुई। मर्दों के चेहरे लटके हुए थे। चुनाव दर चुनाव हारने के बाद उनकी मांसपेशियों का वह दम जवाब दे चुका था, जिससे कभी वे सत्ता की कुर्सियां हिलाया करते थे। अब उनमें इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि वे सीधे माथे पर प्रधानमंत्री की आंखों में आंखें डालकर चुनौती दे सकें।
तभी एक "रणनीतिकार" ने धीरे से फुसफुसाया— "जब पौरुष हारने लगे, तो स्त्री को ढाल बना लो।" अगले ही दिन संसद का नजारा बदल गया। जो काम विपक्षी 'मर्दों' को सीना ठोक कर करना चाहिए था, उसके लिए उन्होंने अपनी महिला सांसदों को आगे कर दिया। यह दृश्य किसी भी सभ्य समाज के लिए डूब मरने जैसा था। वे पुरुष नेता, जो बाहर जाकर वीरता के डिंग हांकते हैं, वे संसद के भीतर महिला सांसदों के आंचल के पीछे छिपकर प्रधानमंत्री की कुर्सी को घेरने की योजना बना रहे थे।
प्रधानमंत्री शांत बैठे थे, जैसे हिमालय का कोई शिखर हो जिसे नीचे मच रहे कोलाहल से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन चारों तरफ जो हो रहा था, वह घृणित था। महिला सांसदों को ढाल बनाकर वे पुरुष नेता पीछे से उकसा रहे थे। मंजर ऐसा था मानो वे अपनी जीत की शक्ति खो चुके हैं और अब अपनी महिलाओं के कंधों पर बंदूक रखकर लोकतंत्र के मंदिर को ही लहूलुहान करना चाहते हैं।
"कितनी अजीब विडंबना है कि जो लोग बाहर 'महिला सशक्तिकरण' का झंडा उठाते हैं, वे संसद के भीतर महिलाओं को अपनी कुंठाओं का 'हथियार' बना रहे हैं। यह वीरता नहीं, यह कायरता का वह चरम है जहाँ पुरुष अपनी हार को छिपाने के लिए स्त्री की गरिमा को दांव पर लगा देता है।"
पार्टी के इन 'महारथियों' ने अब एक नया पैंतरा सीखा है। उन्हें पता है कि वे विकास की बहस में नहीं जीत सकते, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें 'कुटा' जाए। वे चाहते हैं कि मार्शल उन्हें उठाकर बाहर फेंकें, उन पर हल्का बल प्रयोग हो, ताकि वे बाहर जाकर दुनिया को अपना 'विक्टिम कार्ड' दिखा सकें। वे चाहते हैं कि देश की गलियों में आग लगे, ताकि वे उस आग पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंक सकें।
आज जब ये नेता घर जाकर आईने में अपनी शक्ल देखेंगे, तो शायद उन्हें खुद से ही घिन आएगी। वह आईना उनसे पूछेगा— "क्या तुम्हारी राजनीति इतनी गिर गई है कि अब तुम्हें लड़ने के लिए महिला सांसदों के पीछे छिपना पड़ रहा है?" यह लेख उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो सत्ता की भूख में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें अब मां, बहन और मर्यादा के बीच का अंतर भी दिखाई नहीं देता।
#politics #BJP4IND #Congress #bihar #bengali #kolkata
मर्दानी का संकट और महिला सांसदों के पल्लू में छुपकर षड्यंत्र : उनकी मंशा साफ है—संसद में ऐसा माहौल बनाओ कि हिंसा भड़के। अगर प्रधानमंत्री जरा भी विचलित होते, तो ये लोग उसे 'तानाशाही' का प्रमाण बताकर गृहयुद्ध की घोषणा कर देते। लेकिन वे भूल गए कि सामने वाला खिलाड़ी उनकी इस 'घिनौनी पटकथा' को पहले पन्ने से ही पढ़ चुका है।
यह घटना किसी काल्पनिक देश की नहीं, बल्कि उसी व्यवस्था की है जहाँ कभी तर्कों की तलवारें चलती थीं, लेकिन आज वहाँ कुंठाओं के खंजर लहरा रहे हैं। उस पुरानी पार्टी के गलियारों में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि एक अजीब सी छटपटाहट है। वह छटपटाहट जो तब पैदा होती है जब एक शेर बूढ़ा हो जाए और उसके नाखून गिर जाएं, लेकिन शिकार की हवस कम न हो।
पार्टी के भीतर एक गुप्त बैठक हुई। मर्दों के चेहरे लटके हुए थे। चुनाव दर चुनाव हारने के बाद उनकी मांसपेशियों का वह दम जवाब दे चुका था, जिससे कभी वे सत्ता की कुर्सियां हिलाया करते थे। अब उनमें इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि वे सीधे माथे पर प्रधानमंत्री की आंखों में आंखें डालकर चुनौती दे सकें।
तभी एक "रणनीतिकार" ने धीरे से फुसफुसाया— "जब पौरुष हारने लगे, तो स्त्री को ढाल बना लो।" अगले ही दिन संसद का नजारा बदल गया। जो काम विपक्षी 'मर्दों' को सीना ठोक कर करना चाहिए था, उसके लिए उन्होंने अपनी महिला सांसदों को आगे कर दिया। यह दृश्य किसी भी सभ्य समाज के लिए डूब मरने जैसा था। वे पुरुष नेता, जो बाहर जाकर वीरता के डिंग हांकते हैं, वे संसद के भीतर महिला सांसदों के आंचल के पीछे छिपकर प्रधानमंत्री की कुर्सी को घेरने की योजना बना रहे थे।
प्रधानमंत्री शांत बैठे थे, जैसे हिमालय का कोई शिखर हो जिसे नीचे मच रहे कोलाहल से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन चारों तरफ जो हो रहा था, वह घृणित था। महिला सांसदों को ढाल बनाकर वे पुरुष नेता पीछे से उकसा रहे थे। मंजर ऐसा था मानो वे अपनी जीत की शक्ति खो चुके हैं और अब अपनी महिलाओं के कंधों पर बंदूक रखकर लोकतंत्र के मंदिर को ही लहूलुहान करना चाहते हैं।
"कितनी अजीब विडंबना है कि जो लोग बाहर 'महिला सशक्तिकरण' का झंडा उठाते हैं, वे संसद के भीतर महिलाओं को अपनी कुंठाओं का 'हथियार' बना रहे हैं। यह वीरता नहीं, यह कायरता का वह चरम है जहाँ पुरुष अपनी हार को छिपाने के लिए स्त्री की गरिमा को दांव पर लगा देता है।"
पार्टी के इन 'महारथियों' ने अब एक नया पैंतरा सीखा है। उन्हें पता है कि वे विकास की बहस में नहीं जीत सकते, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें 'कुटा' जाए। वे चाहते हैं कि मार्शल उन्हें उठाकर बाहर फेंकें, उन पर हल्का बल प्रयोग हो, ताकि वे बाहर जाकर दुनिया को अपना 'विक्टिम कार्ड' दिखा सकें। वे चाहते हैं कि देश की गलियों में आग लगे, ताकि वे उस आग पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंक सकें।
आज जब ये नेता घर जाकर आईने में अपनी शक्ल देखेंगे, तो शायद उन्हें खुद से ही घिन आएगी। वह आईना उनसे पूछेगा— "क्या तुम्हारी राजनीति इतनी गिर गई है कि अब तुम्हें लड़ने के लिए महिला सांसदों के पीछे छिपना पड़ रहा है?" यह लेख उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो सत्ता की भूख में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें अब मां, बहन और मर्यादा के बीच का अंतर भी दिखाई नहीं देता।
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