तब तो मै भी शंकराचार्य हूं!
आदि शंकराचार्य ने प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा की रक्षा के लिए देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी। पूर्व ओडिशा में गोवर्द्धन मठ (पुरी), पश्चिम गुजरात में शारदा मठ (द्वारिका), उत्तर उत्तराखंड में ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम) एवं दक्षिण रामेश्वर में श्रृंगेरी मठ।
शंकराचार्य के चयन की पारंपरिक प्रक्रिया में एक योग्य संन्यासी को आदि शंकराचार्य के मठाम्नाय के अनुसार, चारों वेदों और छह वेदांगों का ज्ञानी होना चाहिए, फिर अखाड़ों, महामंडलेश्वरों और विद्वानों की सभा में शास्त्रार्थ के बाद काशी विद्वत परिषद की मुहर से पदवी मिलती है, जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा और आंतरिक शुद्धता महत्वपूर्ण हैं। शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य है। इसके अलावा, दंड धारण करने वाला, तन मन से पवित्र, जितेंद्रिय यानी जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो, वाग्मी यानी शास्त्र-तर्क भाषण में निपुण हो, चारों वेद और छह वेदांगों का पारगामी विद्वान होना चाहिए। इसके बाद अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति और काशी विद्वत परिषद की मुहर के बाद शंकराचार्य की पदवी मिलती है।
शंकराचार्य हिंदू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है जो बौद्ध धर्म में दलाईलामा एवं ईसाई धर्म में पोप के समकक्ष है. देश में चार मठों में चार शंकराचार्य होते हैं. स्वामी स्वरूपानंद अकेले ऐसे शंकराचार्य थे, जो दो मठों के प्रमुख थे। इन दोनों मठों से जुड़े अखाड़े और धार्मिक संस्थान और साधु संत निश्चित तौर पर इन दोनों मठों के लिए उनके उत्तराधिकारी यानि प्रमुख का चयन कर सकते हैं लेकिन उन्हें शंकराचार्य की पदवी ऐसे नहीं मिलेगी।
मठ का अर्थ ऐसे संस्थानों से है जहां इसके गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा, उपदेश आदि देने का काम करते हैं। इन्हें पीठ भी कहा जाता है. ये गुरु प्रायः धर्म गुरु होते है. दी गई शिक्षा मुख्यतः आध्यात्मिक होती है. एक मठ में इन कार्यो के अलावा सामाजिक सेवा, साहित्य आदि से संबंधित काम होते हैं. मठ एक ऐसा शब्द है जिसके बहुधार्मिक अर्थ हैं। बौद्ध मठों को विहार कहते हैं. ईसाई धर्म में इन्हें मॉनेट्री, प्रायरी, चार्टरहाउस, एब्बे इत्यादि नामों से जाना जाता है।
ये हैं शंकराचार्यों के चार मठ।ये चारों मठ ईसा से पूर्व आठवीं शताब्दी में स्थापित किए गए थे. ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परंपरा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं। हर शंकराचार्य को अपने जीवनकाल में ही सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी बनाना होता है. ये चार मठ देश के चार कोनों में हैं।
1- उत्तरामण्य मठ या उत्तर मठ, ज्योतिर्मठ जो कि जोशीमठ में स्थित है
2- पूर्वामण्य मठ या पूर्वी मठ, गोवर्धन मठ जो कि पुरी में स्थित है।
3- दक्षिणामण्य मठ या दक्षिणी मठ, शृंगेरी शारदा पीठ जो कि शृंगेरी में स्थित है।
4- पश्चिमामण्य मठ या पश्चिमी मठ, द्वारिका पीठ जो कि द्वारिका में स्थित है।
सनातन व्यवस्था में हजारों संप्रदाय हैं , सभी के अपने अपने पंथ, मत, मठ और आश्रम हैं। सबकी अलग अलग परंपराएं और पूजा पद्धतियां भी है। द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत द्वैताद्वैत भेदाभेद सभी के अपने आचार हैं। देश भर में संन्यासी किसी न किसी मठ से जुड़े होते हैं। संन्यास लेने के बाद दीक्षित नाम के बाद एक विशेषण लगा दिया जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह संन्यासी किस मठ से है। वेद की किस परम्परा का वाहक है। सभी मठ अलग-अलग वेद के प्रचारक होते हैं।
पात्रता और योग्यता (Eligibility & Qualification):
संन्यासी और ब्रह्मचारी: उम्मीदवार को गृहस्थ जीवन त्याग कर पूर्ण संन्यासी और ब्रह्मचारी होना चाहिए।
ब्राह्मण: ब्राह्मण होना अनिवार्य है, लेकिन यह जन्मना जाति से अधिक गुणों (आचरण, ज्ञान) पर आधारित है।
विद्वत्ता: चारों वेदों और छह वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) का गहन ज्ञान होना चाहिए।
नैतिक शुद्धता: इंद्रियों पर नियंत्रण (जितेंद्रिय), मन-वचन-कर्म से शुद्ध, और पवित्र चरित्र का होना आवश्यक है।
शास्त्रीय निपुणता: शास्त्रों और तर्कों (शास्त्रार्थ) में निपुण होना चाहिए।
चयन प्रक्रिया (Selection Process):
गुरु-शिष्य परंपरा: यह प्रक्रिया गुरु-शिष्य परंपरा का पालन करती है, जहां योग्य शिष्य को चुना जाता है।
मठाम्नाय का पालन: चयन आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'मठाम्नाय' नामक ग्रंथ में वर्णित नियमों पर आधारित होता है।
विद्वानों की सहमति: अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों और अन्य प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति ज़रूरी होती है।
काशी विद्वत परिषद की मुहर: चयन प्रक्रिया में काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति और मुहर को अनिवार्य माना जाता है।
अन्य पीठों का समर्थन (ऐतिहासिक): ऐतिहासिक रूप से, अन्य प्रमुख मठों (जैसे श्रृंगेरी, पुरी) के शंकराचार्यों का समर्थन भी महत्वपूर्ण रहा है।
अब सुनिए कहानी शंकराचार्य पीठ ज्योतिर्मठ की।
आदि शंकराचार्य के बाद ज्योतिर्मठ सैकड़ों साल तक निष्क्रिय रहा कोई स्थायी शंकराचार्य नहीं था, परंपरा लगभग टूटी हुई थी।
1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती सामने आते है उन्हें साधु सन्त, अखाड़े और धर्माचार्य सर्वसम्मति से ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित करते हैं।
1952 में शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने एक हस्तलिखित वसीयत तैयार की जिसमें उन्होंने अपने शिष्य शांतानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी के रूप में नामांकित किया।
12 जून 1953 को शांतानंद सरस्वती को शंकराचार्य घोषित किया गया शांतानंद सरस्वती पहले शंकराचार्य थे, जिन्होंने पहले गृहस्थ जीवन भी व्यतीत किया था अर्थात उन्होंने विवाह के बाद सन्यास लिया था।
कुछ लोगों ने उनकी नियुक्ति को परंपरा विरुद्ध बताया और ब्रह्मानंद सरस्वती की वसीयत को अस्वीकार कर दिया। कहा गया कि ब्रह्मानंद की वसीयत पारंपरिक नियमों के खिलाफ थी क्योंकि प्राचीन मठ व्यवस्था में वसीयत का सिद्धांत मौजूद नहीं था।
यह भी दावा किया गया कि ब्रह्मानंद की मानसिक स्थिति वसीयत लिखने के समय सक्रिय स्थिति में नहीं थी।
विरोधी गुट के इन लोगों ने स्वामी कृष्णबोधाश्रम को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया इसके बाद ये मामला कोर्ट चला गया।
1970 में इलाहाबाद सिविल जज ने निर्णय दिया कि शांतानंद सरस्वती की नियुक्ति वैध है कृष्णबोधाश्रम को शंकराचार्य नही माना जा सकता शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ की गद्दी पर विराजे रहते है।
इसी बीच सार्वजनिक इंट्री होती है स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती नाम से मध्य प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष की। वह कुछ संदिग्ध लोगों के साथ सक्रिय होकर साधु संतों के बीच अपनी पैठ जमाते है। करपात्री महाराज के अतिप्रिय कहे जाने लगे।
इस बीच शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती विश्नुदेवनंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देते है।
तत्कालीन सरकार से जुड़े साधु संतों के गुट ने विश्नुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य स्वीकार नहीं किया और अचानक स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती को शंकराचार्य कहना शुरू कर दिया।
इधर विश्नुदेवनंद ने अपने एक शिष्य वासुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य पद सौंप दिया।
मामला कोर्ट में गया । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में फैसला दिया कि स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवनंद सरस्वती दोनों शंकराचार्य के रूप में अवैध हैं।
इसका कारण यह बताया गया कि वासुदेवनंद को विश्नुदेवनंद सरस्वती ने शंकराचार्य नियुक्त किया था और विश्नुदेवनंद की खुद की नियुक्ति ही वैध नही थी। उन्हें मठ के सभी संतों का समर्थन प्राप्त नही था।
स्वामी स्वरूपनान्द को अवैध इसलिए ठहराया गया क्योंकि उनकी भी नियुक्ति भी मठ के संतों द्वारा नही की गई थी, न ही किसी शंकराचार्य द्वारा और न ही धर्म संसद द्वारा वह स्वीकार किए गए। वह मात्र कुछ संदिग्ध सन्तो द्वारा समर्थित स्वघोषित शंकराचार्य थे। चूंकि कांग्रेस समर्थित थे तो मठ की संपत्तियों पर जोर जबरदस्ती से काबिज हो गए।
ध्यान रहे स्वयं करपात्री महराज ने भी उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। स्वरूपानंद किसी शंकराचार्य की जगह पर नही बैठे थे बल्कि वे समानांतर दावेदार बनकर उभरे थे, जो कि परंपरा विरोधी था।
शांतानंद सरस्वती जीवित और पद पर थे। इसलिए स्वरूपनान्द का दावा अवैध और अधर्म की श्रेणी में गिना गया।
इसके बाद स्वामी स्वरूपानंद ने पहले द्वारका पीठ और फिर ज्योतिर्मठ पर दावा कर दिया। कोई भी शंकराचार्य एक साथ दो मठों की गद्दी पर नहीं बैठ सकता । यह परंपरा, शास्त्र और व्यवहार तीनों के विरुद्ध है। पर यह तो सर्वविदित है कांग्रेस सरकार तो हिंदू संस्थाओं को जड़ मूल से ही छिन्न भिन्न करने में लगी थी। इससे धर्मांतरण में मदद मिलती थी।
कुल मिलाकर स्वामी स्वरूपनान्द को शंकराचार्य के रूप अदालत और परंपरा में अवैध शंकराचार्य माना गया।
अब स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने ज़बरदस्ती ज्योतिर्मठ पर दावा कर दिया।
चूँकि स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती ने उन्हें शंकराचार्य घोषित नही किया था और न ही संतों ने उनकी नियुक्ति में परंपरागत नियमों का पालन नहीं हुआ था, मठ के संतों और अखाड़ा परिषद ने भी उन्हें अवैध शंकराचार्य घोषित कर रखा था।
अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद शाही अभिषेक पर रोक लगा दी और 1941 की परंपरा के अनुसार वैध शंकराचार्य की नियुक्ति का निर्देश दिया था।
अब अविमुक्तेश्वरानंद कह रहे हैं कि शंकराचार्य की नियुक्ति करना कोर्ट या सरकार का काम नहीं है। उन्हें कानून की जानकारी नहीं है। कोर्ट का काम शंकराचार्य की नियुक्ति करना नही है। लेकिन जब शंकराचार्य पद के दो दावेदार हो तब यह मामला धर्म-विवाद का नहीं , सिविल विवाद का हो जाता है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में तब कोर्ट निर्देश दे सकती है कि 1941 के नियमों के तहत वैध शंकराचार्य की नियुक्ति हो।
इसका अर्थ यह है कि आज भी ज्योतिर्मठ में कोई वैध शंकराचार्य घोषित नहीं हुआ है।
ज्योर्तिमठ (उत्तराम्नाय पीठ) के शंकराचार्य पद पर इस समय कोई निर्विवाद, सर्वमान्य शंकराचार्य नहीं है। वर्तमान स्थिति में इस पीठ के लिए दो दावेदार सामने आते हैं —अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती । इन दोनों का मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कोर्ट ने अब तक किसी के पट्टाभिषेक/ताजपोशी को मान्यता नहीं दी है।इतना ही नहीं सनातन परंपरा की बाकी तीन अम्नाय पीठें (श्रृंगेरी, पुरी और द्वारका) अब तक किसी एक को भी ज्योर्तिमठ का वैध शंकराचार्य नहीं मानतीं। यानी न सर्वसम्मति है, न स्पष्ट परंपरागत स्वीकृति। अब ऐसे में सवाल उठता है एक दावेदार, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती,लगातार मीडिया और सोशल मीडिया में खुद को “ज्योर्तिमठ का शंकराचार्य” कहकर प्रस्तुत करते हैं। बयान देते हैं, मंचों पर बोलते हैं और एक तय पद की तरह स्वयं को स्थापित करते हैं। जबकि दूसरी ओर अन्य दावेदार मौन धारण किए हुए हैं अपने संयत स्वरूप में निरंतर तप साधना स्वाध्याय आदि में लगे रहते है। वे न मीडिया में आते हैं,न खुद को सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य कहते हैं, न किसी तरह की बयानबाज़ी करते हैं —वे केवल कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं।
अब प्रश्न बहुत सीधा है —
\ud83d\udd39 जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है
\ud83d\udd39 जब तीनों अन्य मठ तटस्थ हैं
\ud83d\udd39 जब यह अब तक परिभाषित ही नहीं हो सका कि
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के वास्तविक उत्तराधिकारी कौन थे तो किस अधिकार से कोई स्वयं को शंकराचार्य घोषित कर रहा है? क्या शंकराचार्य पद प्रचार से तय होता है? या मौन, मर्यादा और परंपरा से? यह पोस्ट किसी व्यक्ति के समर्थन या विरोध के लिए नहीं है। यह हिंदू समाज के विवेक से एक छोटा सा सवाल है।
कुछ साल पहले तक के शंकराचार्य अपने उत्तराधिकारी की तलाश के लिए लंबे समय तक विभिन्न साधक या तपस्यारत सन्यासियों पर दृष्टि बनाए रखते थे। उनसे विभिन्न प्रकार से सूचनाओं एवं संप्रेषण का व्यवहार करते थे। कोई जरूरी नहीं था कि उनके समीप रहने वाला कोई शिष्य ही शंकराचार्य पद पर उत्तराधिकारी के तौर पर बैठाया जाए। ऐसे बहुत से उदाहरण है जब दुर्धर जंगलों में, पहाड़ों पर , ग्राम्य क्षेत्र में, समुद्र नदी तट पर तपस्या कर रहे अद्वैत मार्गी सन्यासियों को बुलाकर पट्टाभिषेक करवाया गया।साधना के समय से ही उन पर भी दृष्टि रहती थी। ऐसे बहुत से सन्यासी भी हुए हैं जिन्होंने पद ग्रहण करने से सविनय पूर्वक मना किया है।
यह तो परम आदरणीय स्वामी स्वरूपानंद जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुकदमा लड़ते हुए जबरदस्ती पद पर अवैध कब्जा बनाए रखा था। स्वामी स्वरूपानंद जी के बारे में बताया जाता है कि वह युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के सक्रिय नेताओं में से और बड़े नेता अर्जुन सिंह के बहुत करीबी थे। शुरुआत में तो कांग्रेस ने यह सारा खेल मठ की संपत्तियों पर रचा, बाद में हिंदू समाज की जड़ों पर मट्ठा डालने में इस प्रकार के संत उनके बहुत काम आए। उनके जीवन के आखिरी तक शंकराचार्य पद पर स्वामी स्वरूपानंद जी की स्वीकार्यता नहीं हो पाई थी। जीवन पर्यंत उनकी साधना -शैली कांग्रेस पार्टी के कैडर के रूप में बनी रही, जिस समाज के धार्मिक प्रमुख होने का वह दावा करते थे उसके हित उनके लिए गौड़ थे। हालांकि शिष्य बहुत से बनाए थे पर उनकी तपस्या अथवा साधना के बारे में किसी को पता नहीं है। बस यह कहा जाता है कि वह करपात्री जी महाराज के शिष्य थे। सब कुछ संदिग्ध है।
संन्यासी बनने के प्रतीक (Symbols of Sanyas) क्या हैं यह भी जान लीजिए। मुंडन (बालों का त्याग)। गेरुआ या संप्रदाय वस्त्र धारण करना। संयम - रुद्राक्ष - धर्म दंड धारण करना। गृहत्याग, दंड (छड़ी) एवं चंवर, भस्म धारण करना और उसकी पवित्रता बनाए रखना। स्वयं का पिंडदान और श्राद्ध करना (पूर्वजों के लिए)। दीक्षा, तपश्चर्या, साधना- योग - अभ्यास और उस पर दिया गया समय, स्वाध्याय - ज्ञान और अंत:बल।
संक्षेप में, शंकराचार्य का पद एक गहन आध्यात्मिक और विद्वत्तापूर्ण यात्रा का परिणाम है, जिसमें लंबी साधना, ज्ञान, त्याग और संत समुदाय के साथ साथ हिंदू समाज की स्वीकृति ही निर्णायक होती है। आप कब्जा करके कभी किसी कीमत पर वह तेज, शक्ति और सम्मान तथा प्रभाव एवं स्वीकार्यता नहीं पा सकते जो इस पद में निहित है।
पूरे नियम पढ़कर आप भी अविमुकेश्वरानन्द के शंकराचार्य पद की योग्यता को जांच लें!
आदि शंकराचार्य ने प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा की रक्षा के लिए देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी। पूर्व ओडिशा में गोवर्द्धन मठ (पुरी), पश्चिम गुजरात में शारदा मठ (द्वारिका), उत्तर उत्तराखंड में ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम) एवं दक्षिण रामेश्वर में श्रृंगेरी मठ।
शंकराचार्य के चयन की पारंपरिक प्रक्रिया में एक योग्य संन्यासी को आदि शंकराचार्य के मठाम्नाय के अनुसार, चारों वेदों और छह वेदांगों का ज्ञानी होना चाहिए, फिर अखाड़ों, महामंडलेश्वरों और विद्वानों की सभा में शास्त्रार्थ के बाद काशी विद्वत परिषद की मुहर से पदवी मिलती है, जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा और आंतरिक शुद्धता महत्वपूर्ण हैं। शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य है। इसके अलावा, दंड धारण करने वाला, तन मन से पवित्र, जितेंद्रिय यानी जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो, वाग्मी यानी शास्त्र-तर्क भाषण में निपुण हो, चारों वेद और छह वेदांगों का पारगामी विद्वान होना चाहिए। इसके बाद अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति और काशी विद्वत परिषद की मुहर के बाद शंकराचार्य की पदवी मिलती है।
शंकराचार्य हिंदू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है जो बौद्ध धर्म में दलाईलामा एवं ईसाई धर्म में पोप के समकक्ष है. देश में चार मठों में चार शंकराचार्य होते हैं. स्वामी स्वरूपानंद अकेले ऐसे शंकराचार्य थे, जो दो मठों के प्रमुख थे। इन दोनों मठों से जुड़े अखाड़े और धार्मिक संस्थान और साधु संत निश्चित तौर पर इन दोनों मठों के लिए उनके उत्तराधिकारी यानि प्रमुख का चयन कर सकते हैं लेकिन उन्हें शंकराचार्य की पदवी ऐसे नहीं मिलेगी।
मठ का अर्थ ऐसे संस्थानों से है जहां इसके गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा, उपदेश आदि देने का काम करते हैं। इन्हें पीठ भी कहा जाता है. ये गुरु प्रायः धर्म गुरु होते है. दी गई शिक्षा मुख्यतः आध्यात्मिक होती है. एक मठ में इन कार्यो के अलावा सामाजिक सेवा, साहित्य आदि से संबंधित काम होते हैं. मठ एक ऐसा शब्द है जिसके बहुधार्मिक अर्थ हैं। बौद्ध मठों को विहार कहते हैं. ईसाई धर्म में इन्हें मॉनेट्री, प्रायरी, चार्टरहाउस, एब्बे इत्यादि नामों से जाना जाता है।
ये हैं शंकराचार्यों के चार मठ।ये चारों मठ ईसा से पूर्व आठवीं शताब्दी में स्थापित किए गए थे. ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परंपरा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं। हर शंकराचार्य को अपने जीवनकाल में ही सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी बनाना होता है. ये चार मठ देश के चार कोनों में हैं।
1- उत्तरामण्य मठ या उत्तर मठ, ज्योतिर्मठ जो कि जोशीमठ में स्थित है
2- पूर्वामण्य मठ या पूर्वी मठ, गोवर्धन मठ जो कि पुरी में स्थित है।
3- दक्षिणामण्य मठ या दक्षिणी मठ, शृंगेरी शारदा पीठ जो कि शृंगेरी में स्थित है।
4- पश्चिमामण्य मठ या पश्चिमी मठ, द्वारिका पीठ जो कि द्वारिका में स्थित है।
सनातन व्यवस्था में हजारों संप्रदाय हैं , सभी के अपने अपने पंथ, मत, मठ और आश्रम हैं। सबकी अलग अलग परंपराएं और पूजा पद्धतियां भी है। द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत द्वैताद्वैत भेदाभेद सभी के अपने आचार हैं। देश भर में संन्यासी किसी न किसी मठ से जुड़े होते हैं। संन्यास लेने के बाद दीक्षित नाम के बाद एक विशेषण लगा दिया जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह संन्यासी किस मठ से है। वेद की किस परम्परा का वाहक है। सभी मठ अलग-अलग वेद के प्रचारक होते हैं।
पात्रता और योग्यता (Eligibility & Qualification):
संन्यासी और ब्रह्मचारी: उम्मीदवार को गृहस्थ जीवन त्याग कर पूर्ण संन्यासी और ब्रह्मचारी होना चाहिए।
ब्राह्मण: ब्राह्मण होना अनिवार्य है, लेकिन यह जन्मना जाति से अधिक गुणों (आचरण, ज्ञान) पर आधारित है।
विद्वत्ता: चारों वेदों और छह वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) का गहन ज्ञान होना चाहिए।
नैतिक शुद्धता: इंद्रियों पर नियंत्रण (जितेंद्रिय), मन-वचन-कर्म से शुद्ध, और पवित्र चरित्र का होना आवश्यक है।
शास्त्रीय निपुणता: शास्त्रों और तर्कों (शास्त्रार्थ) में निपुण होना चाहिए।
चयन प्रक्रिया (Selection Process):
गुरु-शिष्य परंपरा: यह प्रक्रिया गुरु-शिष्य परंपरा का पालन करती है, जहां योग्य शिष्य को चुना जाता है।
मठाम्नाय का पालन: चयन आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'मठाम्नाय' नामक ग्रंथ में वर्णित नियमों पर आधारित होता है।
विद्वानों की सहमति: अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों और अन्य प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति ज़रूरी होती है।
काशी विद्वत परिषद की मुहर: चयन प्रक्रिया में काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति और मुहर को अनिवार्य माना जाता है।
अन्य पीठों का समर्थन (ऐतिहासिक): ऐतिहासिक रूप से, अन्य प्रमुख मठों (जैसे श्रृंगेरी, पुरी) के शंकराचार्यों का समर्थन भी महत्वपूर्ण रहा है।
अब सुनिए कहानी शंकराचार्य पीठ ज्योतिर्मठ की।
आदि शंकराचार्य के बाद ज्योतिर्मठ सैकड़ों साल तक निष्क्रिय रहा कोई स्थायी शंकराचार्य नहीं था, परंपरा लगभग टूटी हुई थी।
1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती सामने आते है उन्हें साधु सन्त, अखाड़े और धर्माचार्य सर्वसम्मति से ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित करते हैं।
1952 में शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने एक हस्तलिखित वसीयत तैयार की जिसमें उन्होंने अपने शिष्य शांतानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी के रूप में नामांकित किया।
12 जून 1953 को शांतानंद सरस्वती को शंकराचार्य घोषित किया गया शांतानंद सरस्वती पहले शंकराचार्य थे, जिन्होंने पहले गृहस्थ जीवन भी व्यतीत किया था अर्थात उन्होंने विवाह के बाद सन्यास लिया था।
कुछ लोगों ने उनकी नियुक्ति को परंपरा विरुद्ध बताया और ब्रह्मानंद सरस्वती की वसीयत को अस्वीकार कर दिया। कहा गया कि ब्रह्मानंद की वसीयत पारंपरिक नियमों के खिलाफ थी क्योंकि प्राचीन मठ व्यवस्था में वसीयत का सिद्धांत मौजूद नहीं था।
यह भी दावा किया गया कि ब्रह्मानंद की मानसिक स्थिति वसीयत लिखने के समय सक्रिय स्थिति में नहीं थी।
विरोधी गुट के इन लोगों ने स्वामी कृष्णबोधाश्रम को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया इसके बाद ये मामला कोर्ट चला गया।
1970 में इलाहाबाद सिविल जज ने निर्णय दिया कि शांतानंद सरस्वती की नियुक्ति वैध है कृष्णबोधाश्रम को शंकराचार्य नही माना जा सकता शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ की गद्दी पर विराजे रहते है।
इसी बीच सार्वजनिक इंट्री होती है स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती नाम से मध्य प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष की। वह कुछ संदिग्ध लोगों के साथ सक्रिय होकर साधु संतों के बीच अपनी पैठ जमाते है। करपात्री महाराज के अतिप्रिय कहे जाने लगे।
इस बीच शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती विश्नुदेवनंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देते है।
तत्कालीन सरकार से जुड़े साधु संतों के गुट ने विश्नुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य स्वीकार नहीं किया और अचानक स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती को शंकराचार्य कहना शुरू कर दिया।
इधर विश्नुदेवनंद ने अपने एक शिष्य वासुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य पद सौंप दिया।
मामला कोर्ट में गया । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में फैसला दिया कि स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवनंद सरस्वती दोनों शंकराचार्य के रूप में अवैध हैं।
इसका कारण यह बताया गया कि वासुदेवनंद को विश्नुदेवनंद सरस्वती ने शंकराचार्य नियुक्त किया था और विश्नुदेवनंद की खुद की नियुक्ति ही वैध नही थी। उन्हें मठ के सभी संतों का समर्थन प्राप्त नही था।
स्वामी स्वरूपनान्द को अवैध इसलिए ठहराया गया क्योंकि उनकी भी नियुक्ति भी मठ के संतों द्वारा नही की गई थी, न ही किसी शंकराचार्य द्वारा और न ही धर्म संसद द्वारा वह स्वीकार किए गए। वह मात्र कुछ संदिग्ध सन्तो द्वारा समर्थित स्वघोषित शंकराचार्य थे। चूंकि कांग्रेस समर्थित थे तो मठ की संपत्तियों पर जोर जबरदस्ती से काबिज हो गए।
ध्यान रहे स्वयं करपात्री महराज ने भी उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। स्वरूपानंद किसी शंकराचार्य की जगह पर नही बैठे थे बल्कि वे समानांतर दावेदार बनकर उभरे थे, जो कि परंपरा विरोधी था।
शांतानंद सरस्वती जीवित और पद पर थे। इसलिए स्वरूपनान्द का दावा अवैध और अधर्म की श्रेणी में गिना गया।
इसके बाद स्वामी स्वरूपानंद ने पहले द्वारका पीठ और फिर ज्योतिर्मठ पर दावा कर दिया। कोई भी शंकराचार्य एक साथ दो मठों की गद्दी पर नहीं बैठ सकता । यह परंपरा, शास्त्र और व्यवहार तीनों के विरुद्ध है। पर यह तो सर्वविदित है कांग्रेस सरकार तो हिंदू संस्थाओं को जड़ मूल से ही छिन्न भिन्न करने में लगी थी। इससे धर्मांतरण में मदद मिलती थी।
कुल मिलाकर स्वामी स्वरूपनान्द को शंकराचार्य के रूप अदालत और परंपरा में अवैध शंकराचार्य माना गया।
अब स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने ज़बरदस्ती ज्योतिर्मठ पर दावा कर दिया।
चूँकि स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती ने उन्हें शंकराचार्य घोषित नही किया था और न ही संतों ने उनकी नियुक्ति में परंपरागत नियमों का पालन नहीं हुआ था, मठ के संतों और अखाड़ा परिषद ने भी उन्हें अवैध शंकराचार्य घोषित कर रखा था।
अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद शाही अभिषेक पर रोक लगा दी और 1941 की परंपरा के अनुसार वैध शंकराचार्य की नियुक्ति का निर्देश दिया था।
अब अविमुक्तेश्वरानंद कह रहे हैं कि शंकराचार्य की नियुक्ति करना कोर्ट या सरकार का काम नहीं है। उन्हें कानून की जानकारी नहीं है। कोर्ट का काम शंकराचार्य की नियुक्ति करना नही है। लेकिन जब शंकराचार्य पद के दो दावेदार हो तब यह मामला धर्म-विवाद का नहीं , सिविल विवाद का हो जाता है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में तब कोर्ट निर्देश दे सकती है कि 1941 के नियमों के तहत वैध शंकराचार्य की नियुक्ति हो।
इसका अर्थ यह है कि आज भी ज्योतिर्मठ में कोई वैध शंकराचार्य घोषित नहीं हुआ है।
ज्योर्तिमठ (उत्तराम्नाय पीठ) के शंकराचार्य पद पर इस समय कोई निर्विवाद, सर्वमान्य शंकराचार्य नहीं है। वर्तमान स्थिति में इस पीठ के लिए दो दावेदार सामने आते हैं —अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती । इन दोनों का मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कोर्ट ने अब तक किसी के पट्टाभिषेक/ताजपोशी को मान्यता नहीं दी है।इतना ही नहीं सनातन परंपरा की बाकी तीन अम्नाय पीठें (श्रृंगेरी, पुरी और द्वारका) अब तक किसी एक को भी ज्योर्तिमठ का वैध शंकराचार्य नहीं मानतीं। यानी न सर्वसम्मति है, न स्पष्ट परंपरागत स्वीकृति। अब ऐसे में सवाल उठता है एक दावेदार, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती,लगातार मीडिया और सोशल मीडिया में खुद को “ज्योर्तिमठ का शंकराचार्य” कहकर प्रस्तुत करते हैं। बयान देते हैं, मंचों पर बोलते हैं और एक तय पद की तरह स्वयं को स्थापित करते हैं। जबकि दूसरी ओर अन्य दावेदार मौन धारण किए हुए हैं अपने संयत स्वरूप में निरंतर तप साधना स्वाध्याय आदि में लगे रहते है। वे न मीडिया में आते हैं,न खुद को सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य कहते हैं, न किसी तरह की बयानबाज़ी करते हैं —वे केवल कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं।
अब प्रश्न बहुत सीधा है —
\ud83d\udd39 जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है
\ud83d\udd39 जब तीनों अन्य मठ तटस्थ हैं
\ud83d\udd39 जब यह अब तक परिभाषित ही नहीं हो सका कि
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के वास्तविक उत्तराधिकारी कौन थे तो किस अधिकार से कोई स्वयं को शंकराचार्य घोषित कर रहा है? क्या शंकराचार्य पद प्रचार से तय होता है? या मौन, मर्यादा और परंपरा से? यह पोस्ट किसी व्यक्ति के समर्थन या विरोध के लिए नहीं है। यह हिंदू समाज के विवेक से एक छोटा सा सवाल है।
कुछ साल पहले तक के शंकराचार्य अपने उत्तराधिकारी की तलाश के लिए लंबे समय तक विभिन्न साधक या तपस्यारत सन्यासियों पर दृष्टि बनाए रखते थे। उनसे विभिन्न प्रकार से सूचनाओं एवं संप्रेषण का व्यवहार करते थे। कोई जरूरी नहीं था कि उनके समीप रहने वाला कोई शिष्य ही शंकराचार्य पद पर उत्तराधिकारी के तौर पर बैठाया जाए। ऐसे बहुत से उदाहरण है जब दुर्धर जंगलों में, पहाड़ों पर , ग्राम्य क्षेत्र में, समुद्र नदी तट पर तपस्या कर रहे अद्वैत मार्गी सन्यासियों को बुलाकर पट्टाभिषेक करवाया गया।साधना के समय से ही उन पर भी दृष्टि रहती थी। ऐसे बहुत से सन्यासी भी हुए हैं जिन्होंने पद ग्रहण करने से सविनय पूर्वक मना किया है।
यह तो परम आदरणीय स्वामी स्वरूपानंद जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुकदमा लड़ते हुए जबरदस्ती पद पर अवैध कब्जा बनाए रखा था। स्वामी स्वरूपानंद जी के बारे में बताया जाता है कि वह युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के सक्रिय नेताओं में से और बड़े नेता अर्जुन सिंह के बहुत करीबी थे। शुरुआत में तो कांग्रेस ने यह सारा खेल मठ की संपत्तियों पर रचा, बाद में हिंदू समाज की जड़ों पर मट्ठा डालने में इस प्रकार के संत उनके बहुत काम आए। उनके जीवन के आखिरी तक शंकराचार्य पद पर स्वामी स्वरूपानंद जी की स्वीकार्यता नहीं हो पाई थी। जीवन पर्यंत उनकी साधना -शैली कांग्रेस पार्टी के कैडर के रूप में बनी रही, जिस समाज के धार्मिक प्रमुख होने का वह दावा करते थे उसके हित उनके लिए गौड़ थे। हालांकि शिष्य बहुत से बनाए थे पर उनकी तपस्या अथवा साधना के बारे में किसी को पता नहीं है। बस यह कहा जाता है कि वह करपात्री जी महाराज के शिष्य थे। सब कुछ संदिग्ध है।
संन्यासी बनने के प्रतीक (Symbols of Sanyas) क्या हैं यह भी जान लीजिए। मुंडन (बालों का त्याग)। गेरुआ या संप्रदाय वस्त्र धारण करना। संयम - रुद्राक्ष - धर्म दंड धारण करना। गृहत्याग, दंड (छड़ी) एवं चंवर, भस्म धारण करना और उसकी पवित्रता बनाए रखना। स्वयं का पिंडदान और श्राद्ध करना (पूर्वजों के लिए)। दीक्षा, तपश्चर्या, साधना- योग - अभ्यास और उस पर दिया गया समय, स्वाध्याय - ज्ञान और अंत:बल।
संक्षेप में, शंकराचार्य का पद एक गहन आध्यात्मिक और विद्वत्तापूर्ण यात्रा का परिणाम है, जिसमें लंबी साधना, ज्ञान, त्याग और संत समुदाय के साथ साथ हिंदू समाज की स्वीकृति ही निर्णायक होती है। आप कब्जा करके कभी किसी कीमत पर वह तेज, शक्ति और सम्मान तथा प्रभाव एवं स्वीकार्यता नहीं पा सकते जो इस पद में निहित है।
पूरे नियम पढ़कर आप भी अविमुकेश्वरानन्द के शंकराचार्य पद की योग्यता को जांच लें!
तब तो मै भी शंकराचार्य हूं!
आदि शंकराचार्य ने प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा की रक्षा के लिए देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी। पूर्व ओडिशा में गोवर्द्धन मठ (पुरी), पश्चिम गुजरात में शारदा मठ (द्वारिका), उत्तर उत्तराखंड में ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम) एवं दक्षिण रामेश्वर में श्रृंगेरी मठ।
शंकराचार्य के चयन की पारंपरिक प्रक्रिया में एक योग्य संन्यासी को आदि शंकराचार्य के मठाम्नाय के अनुसार, चारों वेदों और छह वेदांगों का ज्ञानी होना चाहिए, फिर अखाड़ों, महामंडलेश्वरों और विद्वानों की सभा में शास्त्रार्थ के बाद काशी विद्वत परिषद की मुहर से पदवी मिलती है, जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा और आंतरिक शुद्धता महत्वपूर्ण हैं। शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य है। इसके अलावा, दंड धारण करने वाला, तन मन से पवित्र, जितेंद्रिय यानी जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो, वाग्मी यानी शास्त्र-तर्क भाषण में निपुण हो, चारों वेद और छह वेदांगों का पारगामी विद्वान होना चाहिए। इसके बाद अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति और काशी विद्वत परिषद की मुहर के बाद शंकराचार्य की पदवी मिलती है।
शंकराचार्य हिंदू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है जो बौद्ध धर्म में दलाईलामा एवं ईसाई धर्म में पोप के समकक्ष है. देश में चार मठों में चार शंकराचार्य होते हैं. स्वामी स्वरूपानंद अकेले ऐसे शंकराचार्य थे, जो दो मठों के प्रमुख थे। इन दोनों मठों से जुड़े अखाड़े और धार्मिक संस्थान और साधु संत निश्चित तौर पर इन दोनों मठों के लिए उनके उत्तराधिकारी यानि प्रमुख का चयन कर सकते हैं लेकिन उन्हें शंकराचार्य की पदवी ऐसे नहीं मिलेगी।
मठ का अर्थ ऐसे संस्थानों से है जहां इसके गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा, उपदेश आदि देने का काम करते हैं। इन्हें पीठ भी कहा जाता है. ये गुरु प्रायः धर्म गुरु होते है. दी गई शिक्षा मुख्यतः आध्यात्मिक होती है. एक मठ में इन कार्यो के अलावा सामाजिक सेवा, साहित्य आदि से संबंधित काम होते हैं. मठ एक ऐसा शब्द है जिसके बहुधार्मिक अर्थ हैं। बौद्ध मठों को विहार कहते हैं. ईसाई धर्म में इन्हें मॉनेट्री, प्रायरी, चार्टरहाउस, एब्बे इत्यादि नामों से जाना जाता है।
ये हैं शंकराचार्यों के चार मठ।ये चारों मठ ईसा से पूर्व आठवीं शताब्दी में स्थापित किए गए थे. ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परंपरा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं। हर शंकराचार्य को अपने जीवनकाल में ही सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी बनाना होता है. ये चार मठ देश के चार कोनों में हैं।
1- उत्तरामण्य मठ या उत्तर मठ, ज्योतिर्मठ जो कि जोशीमठ में स्थित है
2- पूर्वामण्य मठ या पूर्वी मठ, गोवर्धन मठ जो कि पुरी में स्थित है।
3- दक्षिणामण्य मठ या दक्षिणी मठ, शृंगेरी शारदा पीठ जो कि शृंगेरी में स्थित है।
4- पश्चिमामण्य मठ या पश्चिमी मठ, द्वारिका पीठ जो कि द्वारिका में स्थित है।
सनातन व्यवस्था में हजारों संप्रदाय हैं , सभी के अपने अपने पंथ, मत, मठ और आश्रम हैं। सबकी अलग अलग परंपराएं और पूजा पद्धतियां भी है। द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत द्वैताद्वैत भेदाभेद सभी के अपने आचार हैं। देश भर में संन्यासी किसी न किसी मठ से जुड़े होते हैं। संन्यास लेने के बाद दीक्षित नाम के बाद एक विशेषण लगा दिया जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह संन्यासी किस मठ से है। वेद की किस परम्परा का वाहक है। सभी मठ अलग-अलग वेद के प्रचारक होते हैं।
पात्रता और योग्यता (Eligibility & Qualification):
संन्यासी और ब्रह्मचारी: उम्मीदवार को गृहस्थ जीवन त्याग कर पूर्ण संन्यासी और ब्रह्मचारी होना चाहिए।
ब्राह्मण: ब्राह्मण होना अनिवार्य है, लेकिन यह जन्मना जाति से अधिक गुणों (आचरण, ज्ञान) पर आधारित है।
विद्वत्ता: चारों वेदों और छह वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) का गहन ज्ञान होना चाहिए।
नैतिक शुद्धता: इंद्रियों पर नियंत्रण (जितेंद्रिय), मन-वचन-कर्म से शुद्ध, और पवित्र चरित्र का होना आवश्यक है।
शास्त्रीय निपुणता: शास्त्रों और तर्कों (शास्त्रार्थ) में निपुण होना चाहिए।
चयन प्रक्रिया (Selection Process):
गुरु-शिष्य परंपरा: यह प्रक्रिया गुरु-शिष्य परंपरा का पालन करती है, जहां योग्य शिष्य को चुना जाता है।
मठाम्नाय का पालन: चयन आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'मठाम्नाय' नामक ग्रंथ में वर्णित नियमों पर आधारित होता है।
विद्वानों की सहमति: अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों और अन्य प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति ज़रूरी होती है।
काशी विद्वत परिषद की मुहर: चयन प्रक्रिया में काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति और मुहर को अनिवार्य माना जाता है।
अन्य पीठों का समर्थन (ऐतिहासिक): ऐतिहासिक रूप से, अन्य प्रमुख मठों (जैसे श्रृंगेरी, पुरी) के शंकराचार्यों का समर्थन भी महत्वपूर्ण रहा है।
अब सुनिए कहानी शंकराचार्य पीठ ज्योतिर्मठ की।
आदि शंकराचार्य के बाद ज्योतिर्मठ सैकड़ों साल तक निष्क्रिय रहा कोई स्थायी शंकराचार्य नहीं था, परंपरा लगभग टूटी हुई थी।
1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती सामने आते है उन्हें साधु सन्त, अखाड़े और धर्माचार्य सर्वसम्मति से ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित करते हैं।
1952 में शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने एक हस्तलिखित वसीयत तैयार की जिसमें उन्होंने अपने शिष्य शांतानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी के रूप में नामांकित किया।
12 जून 1953 को शांतानंद सरस्वती को शंकराचार्य घोषित किया गया शांतानंद सरस्वती पहले शंकराचार्य थे, जिन्होंने पहले गृहस्थ जीवन भी व्यतीत किया था अर्थात उन्होंने विवाह के बाद सन्यास लिया था।
कुछ लोगों ने उनकी नियुक्ति को परंपरा विरुद्ध बताया और ब्रह्मानंद सरस्वती की वसीयत को अस्वीकार कर दिया। कहा गया कि ब्रह्मानंद की वसीयत पारंपरिक नियमों के खिलाफ थी क्योंकि प्राचीन मठ व्यवस्था में वसीयत का सिद्धांत मौजूद नहीं था।
यह भी दावा किया गया कि ब्रह्मानंद की मानसिक स्थिति वसीयत लिखने के समय सक्रिय स्थिति में नहीं थी।
विरोधी गुट के इन लोगों ने स्वामी कृष्णबोधाश्रम को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया इसके बाद ये मामला कोर्ट चला गया।
1970 में इलाहाबाद सिविल जज ने निर्णय दिया कि शांतानंद सरस्वती की नियुक्ति वैध है कृष्णबोधाश्रम को शंकराचार्य नही माना जा सकता शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ की गद्दी पर विराजे रहते है।
इसी बीच सार्वजनिक इंट्री होती है स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती नाम से मध्य प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष की। वह कुछ संदिग्ध लोगों के साथ सक्रिय होकर साधु संतों के बीच अपनी पैठ जमाते है। करपात्री महाराज के अतिप्रिय कहे जाने लगे।
इस बीच शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती विश्नुदेवनंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देते है।
तत्कालीन सरकार से जुड़े साधु संतों के गुट ने विश्नुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य स्वीकार नहीं किया और अचानक स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती को शंकराचार्य कहना शुरू कर दिया।
इधर विश्नुदेवनंद ने अपने एक शिष्य वासुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य पद सौंप दिया।
मामला कोर्ट में गया । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में फैसला दिया कि स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवनंद सरस्वती दोनों शंकराचार्य के रूप में अवैध हैं।
इसका कारण यह बताया गया कि वासुदेवनंद को विश्नुदेवनंद सरस्वती ने शंकराचार्य नियुक्त किया था और विश्नुदेवनंद की खुद की नियुक्ति ही वैध नही थी। उन्हें मठ के सभी संतों का समर्थन प्राप्त नही था।
स्वामी स्वरूपनान्द को अवैध इसलिए ठहराया गया क्योंकि उनकी भी नियुक्ति भी मठ के संतों द्वारा नही की गई थी, न ही किसी शंकराचार्य द्वारा और न ही धर्म संसद द्वारा वह स्वीकार किए गए। वह मात्र कुछ संदिग्ध सन्तो द्वारा समर्थित स्वघोषित शंकराचार्य थे। चूंकि कांग्रेस समर्थित थे तो मठ की संपत्तियों पर जोर जबरदस्ती से काबिज हो गए।
ध्यान रहे स्वयं करपात्री महराज ने भी उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। स्वरूपानंद किसी शंकराचार्य की जगह पर नही बैठे थे बल्कि वे समानांतर दावेदार बनकर उभरे थे, जो कि परंपरा विरोधी था।
शांतानंद सरस्वती जीवित और पद पर थे। इसलिए स्वरूपनान्द का दावा अवैध और अधर्म की श्रेणी में गिना गया।
इसके बाद स्वामी स्वरूपानंद ने पहले द्वारका पीठ और फिर ज्योतिर्मठ पर दावा कर दिया। कोई भी शंकराचार्य एक साथ दो मठों की गद्दी पर नहीं बैठ सकता । यह परंपरा, शास्त्र और व्यवहार तीनों के विरुद्ध है। पर यह तो सर्वविदित है कांग्रेस सरकार तो हिंदू संस्थाओं को जड़ मूल से ही छिन्न भिन्न करने में लगी थी। इससे धर्मांतरण में मदद मिलती थी।
कुल मिलाकर स्वामी स्वरूपनान्द को शंकराचार्य के रूप अदालत और परंपरा में अवैध शंकराचार्य माना गया।
अब स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने ज़बरदस्ती ज्योतिर्मठ पर दावा कर दिया।
चूँकि स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती ने उन्हें शंकराचार्य घोषित नही किया था और न ही संतों ने उनकी नियुक्ति में परंपरागत नियमों का पालन नहीं हुआ था, मठ के संतों और अखाड़ा परिषद ने भी उन्हें अवैध शंकराचार्य घोषित कर रखा था।
अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद शाही अभिषेक पर रोक लगा दी और 1941 की परंपरा के अनुसार वैध शंकराचार्य की नियुक्ति का निर्देश दिया था।
अब अविमुक्तेश्वरानंद कह रहे हैं कि शंकराचार्य की नियुक्ति करना कोर्ट या सरकार का काम नहीं है। उन्हें कानून की जानकारी नहीं है। कोर्ट का काम शंकराचार्य की नियुक्ति करना नही है। लेकिन जब शंकराचार्य पद के दो दावेदार हो तब यह मामला धर्म-विवाद का नहीं , सिविल विवाद का हो जाता है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में तब कोर्ट निर्देश दे सकती है कि 1941 के नियमों के तहत वैध शंकराचार्य की नियुक्ति हो।
इसका अर्थ यह है कि आज भी ज्योतिर्मठ में कोई वैध शंकराचार्य घोषित नहीं हुआ है।
ज्योर्तिमठ (उत्तराम्नाय पीठ) के शंकराचार्य पद पर इस समय कोई निर्विवाद, सर्वमान्य शंकराचार्य नहीं है। वर्तमान स्थिति में इस पीठ के लिए दो दावेदार सामने आते हैं —अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती । इन दोनों का मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कोर्ट ने अब तक किसी के पट्टाभिषेक/ताजपोशी को मान्यता नहीं दी है।इतना ही नहीं सनातन परंपरा की बाकी तीन अम्नाय पीठें (श्रृंगेरी, पुरी और द्वारका) अब तक किसी एक को भी ज्योर्तिमठ का वैध शंकराचार्य नहीं मानतीं। यानी न सर्वसम्मति है, न स्पष्ट परंपरागत स्वीकृति। अब ऐसे में सवाल उठता है एक दावेदार, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती,लगातार मीडिया और सोशल मीडिया में खुद को “ज्योर्तिमठ का शंकराचार्य” कहकर प्रस्तुत करते हैं। बयान देते हैं, मंचों पर बोलते हैं और एक तय पद की तरह स्वयं को स्थापित करते हैं। जबकि दूसरी ओर अन्य दावेदार मौन धारण किए हुए हैं अपने संयत स्वरूप में निरंतर तप साधना स्वाध्याय आदि में लगे रहते है। वे न मीडिया में आते हैं,न खुद को सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य कहते हैं, न किसी तरह की बयानबाज़ी करते हैं —वे केवल कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं।
अब प्रश्न बहुत सीधा है —
\ud83d\udd39 जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है
\ud83d\udd39 जब तीनों अन्य मठ तटस्थ हैं
\ud83d\udd39 जब यह अब तक परिभाषित ही नहीं हो सका कि
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के वास्तविक उत्तराधिकारी कौन थे तो किस अधिकार से कोई स्वयं को शंकराचार्य घोषित कर रहा है? क्या शंकराचार्य पद प्रचार से तय होता है? या मौन, मर्यादा और परंपरा से? यह पोस्ट किसी व्यक्ति के समर्थन या विरोध के लिए नहीं है। यह हिंदू समाज के विवेक से एक छोटा सा सवाल है।
कुछ साल पहले तक के शंकराचार्य अपने उत्तराधिकारी की तलाश के लिए लंबे समय तक विभिन्न साधक या तपस्यारत सन्यासियों पर दृष्टि बनाए रखते थे। उनसे विभिन्न प्रकार से सूचनाओं एवं संप्रेषण का व्यवहार करते थे। कोई जरूरी नहीं था कि उनके समीप रहने वाला कोई शिष्य ही शंकराचार्य पद पर उत्तराधिकारी के तौर पर बैठाया जाए। ऐसे बहुत से उदाहरण है जब दुर्धर जंगलों में, पहाड़ों पर , ग्राम्य क्षेत्र में, समुद्र नदी तट पर तपस्या कर रहे अद्वैत मार्गी सन्यासियों को बुलाकर पट्टाभिषेक करवाया गया।साधना के समय से ही उन पर भी दृष्टि रहती थी। ऐसे बहुत से सन्यासी भी हुए हैं जिन्होंने पद ग्रहण करने से सविनय पूर्वक मना किया है।
यह तो परम आदरणीय स्वामी स्वरूपानंद जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुकदमा लड़ते हुए जबरदस्ती पद पर अवैध कब्जा बनाए रखा था। स्वामी स्वरूपानंद जी के बारे में बताया जाता है कि वह युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के सक्रिय नेताओं में से और बड़े नेता अर्जुन सिंह के बहुत करीबी थे। शुरुआत में तो कांग्रेस ने यह सारा खेल मठ की संपत्तियों पर रचा, बाद में हिंदू समाज की जड़ों पर मट्ठा डालने में इस प्रकार के संत उनके बहुत काम आए। उनके जीवन के आखिरी तक शंकराचार्य पद पर स्वामी स्वरूपानंद जी की स्वीकार्यता नहीं हो पाई थी। जीवन पर्यंत उनकी साधना -शैली कांग्रेस पार्टी के कैडर के रूप में बनी रही, जिस समाज के धार्मिक प्रमुख होने का वह दावा करते थे उसके हित उनके लिए गौड़ थे। हालांकि शिष्य बहुत से बनाए थे पर उनकी तपस्या अथवा साधना के बारे में किसी को पता नहीं है। बस यह कहा जाता है कि वह करपात्री जी महाराज के शिष्य थे। सब कुछ संदिग्ध है।
संन्यासी बनने के प्रतीक (Symbols of Sanyas) क्या हैं यह भी जान लीजिए। मुंडन (बालों का त्याग)। गेरुआ या संप्रदाय वस्त्र धारण करना। संयम - रुद्राक्ष - धर्म दंड धारण करना। गृहत्याग, दंड (छड़ी) एवं चंवर, भस्म धारण करना और उसकी पवित्रता बनाए रखना। स्वयं का पिंडदान और श्राद्ध करना (पूर्वजों के लिए)। दीक्षा, तपश्चर्या, साधना- योग - अभ्यास और उस पर दिया गया समय, स्वाध्याय - ज्ञान और अंत:बल।
संक्षेप में, शंकराचार्य का पद एक गहन आध्यात्मिक और विद्वत्तापूर्ण यात्रा का परिणाम है, जिसमें लंबी साधना, ज्ञान, त्याग और संत समुदाय के साथ साथ हिंदू समाज की स्वीकृति ही निर्णायक होती है। आप कब्जा करके कभी किसी कीमत पर वह तेज, शक्ति और सम्मान तथा प्रभाव एवं स्वीकार्यता नहीं पा सकते जो इस पद में निहित है।
पूरे नियम पढ़कर आप भी अविमुकेश्वरानन्द के शंकराचार्य पद की योग्यता को जांच लें!
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