साभार....
कहि न जाइ का कहिए…
अनुचित क्रोध की परिणति अनर्थ एवं ग्लानि में होती है। अहंकार जितना प्रबल होता है, इस अनर्थ की पहचान उतनी ही देर से होती है। कभी-कभी यह विलम्ब यावज्जीवन भी हो जाता है। तीर्थराज प्रयाग में उपस्थित प्रसंग ऐसा ही एक उदाहरण बनकर उभरा है, जिसका परिणाम अनर्थ एवं पछतावे से अधिक कुछ नहीं होगा। पर, अभी इसके पक्ष-विपक्ष का उत्साह देखते ही बनता है। लग रहा है कि धर्मरक्षा की यही लड़ाई अन्तिम और निर्णायक होने वाली है। बिना भगवान् के अवतार के ही विप्र-धेनु की रक्षा मीडया/सोशल प्लेटफॉर्म के वाग्वीर कर लेंगे। इस विडम्बना का सर्वाधिक क्षोभ सन्त-समाज के हृदय में है। किंकर्त्तव्यमूढता जैसी स्थिति है, क्या कहें और क्या न कहें। ऐसी परिस्थिति में कुछ बिन्दु विनम्रता से यहाँ रखना आवश्यक लग रहा है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द हम सबके आदरणीय हैं। उनके शंकराचार्य होने को लेकर हमारा कोई मतामत नहीं है, किसी भी दूसरे-तीसरे या चौथे व्यक्ति का नहीं होना चाहिए। उसकी एक सम्प्रदायनिष्ठ, परम्पराप्राप्त व्यवस्था है, अतः उसे वहीं से सुनिश्चित होने देना चाहिए। परन्तु, शंकराचार्य पद-प्रतिष्ठित होने से पूर्व वे भारतीय मनुष्य हैं, सुशिक्षित हैं, प्रबुद्ध हैं और इन सबसे बढ़कर साधु हैं, साधु समाज के सम्मानित प्रतिनिध हैं। उन्हें अपने इन सभी परिचयों का मान रखना चाहिए, जिसमें वे बार-बार चूक रहे हैं। उनकी भर्त्सना अपनी ही भर्त्सना है, अपने आप पर ही लानत है, क्योंकि यदि वे शंकराचार्य न भी हों (हालाँकि, ऐसा कोई मत हमारा नहीं है) तब भी उनका अपने स्वरूप के विरुद्ध जाना अत्यन्त दुखद है। यह बहुत ही कठिन है कि स्वामी जी की क्रोधातुर वाणी/व्यवहार का अनुमोदन या प्रतिवाद कैसे किया जाय।
प्रयाग प्रसंग में पुलिस की भूमिका घोर निन्दनीय है। पुलिस कर्मियों का बर्ताव कुण्ठा और चिढ़ से भरा हुआ था। यदि यह उकसावे के कारण था (हालाँकि, यह एक पक्ष मात्र है) तब भी पुलिस ने गैर प्रोफेशनल/ अमानवीय तथा बर्बर कृत्य किया है। स्वामी जी के साथ आये ब्रह्मचारी/सन्न्यासी अपने अभ्यास के अनुरूप अपने आचार्य का साथ दे रहे थे, एक दृष्टि से वे निर्दोष थे। उनके प्रति हिंसक होकर पुलिसबल ने स्वयं को कलंकित ही किया है। यद्यपि किसी आचार्य के सेवादारों से एक स्तर की पारिस्थितिक समझ भी अपेक्षित होती है, जिसका अभाव देखा गया। दुर्भाग्य से स्वामी जी ने भी अपने अनुयायियों को परिस्थिति असामान्य बनाने से वर्जित नहीं किया।
एक और बात ध्यान देने की है, पुलिस के अनुसार स्वामी जी ने अपने दल-बल के साथ आपातकालीन पुल का बैरिअर तोड़ा और बलपूर्वक पुल पार कर गये, यदि यह सच है तो पुलिस ने वहीं अपनी दृढ़ता क्यों नहीं दिखाई। वहीं बैरिअर तोड़ते लोगों को क्यों नहीं रोका गया। उनके संगम स्नान घाट पर पहुँच जाने के बाद (जैसा कि स्नानार्थ गये हमने स्वयं देखा) ऐसी वर्जना के बजाय उनको येन-केन प्रकारेण स्नान करा देना क्या अधिक अच्छा विकल्प नहीं हो सकता था। प्रतिबन्ध तोड़कर आ गये इसलिए अब हम आपको बेइज्जत करेंगे, एक आचार्य के प्रति पुलिस का ऐसा दुराग्रह अनुचित हुआ।
पुनश्च, स्वामी जी जितने राजनैतिक स्वर में अपनी बात कहते हैं वह उनके आचार्यत्व को धूमिल करता है। वे तर्क देते हैं कि नेता धर्म में हस्तक्षेप न करें तो हम राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि नेताओं को भ्रष्ट कहा जाये तो आप भी यही उपाधि अंगीकार कर लेंगे। यह बहुत लचर तर्क है। फिर नेता (सच या झूठ ) जनभावनाओं पर काम करते हैं, धर्म जनभावना का केन्द्रीय तत्त्व है अतः नेताओं का उससे जुड़ना स्वाभाविक है। दूसरी बात यह भी है कि जब आप एकाकी ही धर्मोद्धार का आग्रह प्रकट करते हैं तो ध्वनित होता है कि अन्य सारे आचार्य उन अधर्मों से सहमत हैं, जिनकी प्रतिक्रिया आप दे रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो सत्ता के साथ आपका ऐसा द्वन्द्व क्यों है। आपकी धार्मिक परिष्कार की कार्ययोजना अन्य समान्तर आचार्यो के साथ तालमेल क्यों नहीं बना पाती है।
पूज्य पुरी पीठाधीश्वर, पूज्य शृंगेरी पीठाधीश्वर अथवा आपके गुरुभाई पूज्य द्वारिका पीठाधीश्वर प्रभृति आचार्यों ने आपके इस प्रसंग पर प्रायः मौन रखा या फिर बोलते हुए संयम बरता। इसका ये अर्थ नहीं कि वे भीरु हैं, वे अपने आचार्यत्व का मान रखते हैं। उन्हें ध्यान है कि राष्ट्र आज केवल धर्मशास्त्र के अधीन नहीं है। हमारी सामाजिक योजना एक संविधान के अनुरूप चलती है। उससे अनेक अंशों में हम सहमत-असहमत हो सकते हैं परन्तु उसे अमान्य करना अभी सम्भव नहीं है। आपके मुकदमे, सम्पत्तियों के पंजीकरण तथा आपकी सुरक्षा/प्रोटोकॉल उसी व्यवस्था से निर्धारित होते हैं। अराजकता फैलाना आचार्य का दायित्त्व नहीं हो सकता है।
अपने काषाय, दण्ड, त्रिपुण्ड और आचार्यत्व को भूरिशः लज्जित करते हुए स्वामी जी जिस प्रकार सत्ता के भृतकों/अधिकारियों से भिड़ते हैं वह विचलित करने वाला होता है। और, इसके पीछे जो तर्क हैं वे इतने नये और अनूठे नहीं हैं कि अब इस देश अथवा दुनिया की सारी बुराइयाँ उनके क्रोध से दूर हो जाने वाली हैं।
यह भूलना कठिन है कि गत महाकुम्भ की दारुण त्रासदी के बीच जब देश शोकग्रस्त था स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द जी ने उस दुर्घटना का उत्तरदायी मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ को ठहराते हुए सत्ता का विपक्ष बनकर एक भयानक राजनैतिक उपद्रव प्रकट कर दिया था। इस बार भी अपने बटुकों-सन्न्यासियों को पुलिस से गुत्थमगुत्था होते देखकर भी, पिटते देखकर भी स्वामी जी रथ से नीचे नहीं उतरे। वे बस मीडिया के सम्मुख क्रन्दन करते रहे कि हमने योगी को दोषी कहा था, इसलिए हमसे बदला लिया जा रहा है। कितना हास्यास्पद है कि ये बदला माघमेले की प्लाटिंग में नहीं लिया गया, शिविर की भव्य सुविधाओं में नहीं लिया गया, पुलिस प्रोटोकॉल में नहीं लिया गया। संगम तट पर लाखों की भीड़ के सम्मुख आपसे बदला लेकर सरकार स्वयं को खलनायक बनाएगी, यह बालकोचित तर्क आप किसे देते हैं।
जब अपनी सम्प्रभुता के वेग में स्वामी जी भारत के महामहिम राष्ट्रपति की सीमाएँ रेखांकित करते हैं, तब वे सन्यासी या आचार्य होने से पूर्व अपनी नागरिकता का मान भंग करते हैं, राष्ट्र की सम्प्रभुता को तिरस्कृत करते हैं। तब पूज्य स्वामी जी भूल जाते हैं कि उनका विद्यालयी स्वाध्याय, उनकी शास्त्री-आचार्यादि की उपाधियाँ, उनके मठ की रजिस्ट्री, उनका वैभव, सोना-चाँदी और वे सभी उपादान जो स्वामी जी को रथ/पालकी अथवा सोने-चाँदी के सिंहासन पर आरूढ़ करते हैं, उन सबका अस्तित्व राष्ट्र की सम्प्रभुता से संरक्षित होता है। वही राष्ट्र जिसका प्रतिनिधित्व राष्ट्रपति करते हैं।
भारत की एक विशिष्ट आध्यात्मिक परम्परा के सर्वमान्य पीठाधीश्वर तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री को हुमायूँ का बेटा या औरंगजेब कहते हुए स्वामी जी गुरु गोरक्षनाथ, गोरक्षपीठ की पुण्यपरम्परा तथा गोरक्ष-परम्परा के धार्मिक-सामाजिक अवदान की न केवल अवमानना करते हैं, बल्कि वे अपने वेष/भाषा की मर्यादा भी भूल जाते हैं।
क्रोध सदा बल का चिह्न नहीं होता। भगवान् परशुराम को अपने शिष्य से पराजित होना पड़ा था। श्रीराम से तो जगत् बिदित है ही। यह बार-बार फरसा दिखाना अशान्ति को जन्म देता है। अपने दुराग्रहों से सत्ता को खलनायक बताते हुए योगी को औरंगजेब कहने वाले स्वामी जी लाठियों से पिटवाने वाले नेता को अखिलेश ‘जी’ कहते हैं। चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुँचाने की यह तकनीक धार्मिक विश्वासों को अपमानित करने के मार्ग से आगे बढ़ती है, जिसका एक उदाहरण बटुकों की प्रताड़ना के रूप में सामने आया है। विक्टिम बनकर जनता में योगी सरकार के प्रति आक्रोश भरने का यह खेल आत्मघाती है। एक सन्त का यह मार्ग कदापि नहीं होना चाहिए।
गोरक्षा का प्रश्न इस देश में नया नहीं है। पूज्य धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज इस आन्दोलन का नेतृत्व कर चुके हैं। वहाँ भी अनियन्त्रित हुए द्वन्द्व तथा सत्ता के साथ संघर्ष के कारण दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम आये और उसकी आधी शती बीत जाने के बाद भी संघर्ष शेष ही है। थोड़ा भी देशकाल का बोध जिन्हें है वे जानते हैं कि गोरक्षा का संवैधानिक विषय भारत के लिए जितना मौलिक एवं आवश्यक है, यह उतना ही जटिल भी है। गोरक्षा-कानून के अपने आश्वासन को पूरा न कर पाने की काँग्रेस की विफलता से क्षुब्ध होकर भारत की नागरिकता से त्यागपत्र देने वाले पूज्य ब्रह्मचारी गुरूजी के आशीर्वाद का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उनके अनेक संस्मरण इस विषय पर सुने हैं। तब नेपाल हिन्दू राष्ट्र था, उनके पास विकल्प था आज वह भी नहीं है।
प्रसंगवश यह भी कहना आवश्यक है कि, गोरक्षा केवल हत्यारों से लड़ाई करना भर नहीं है। जो गाय का उत्पाद उपयोग करते हैं और गोपालन नहीं करते वे वास्तविक गो-हत्यारे हैं। आचार्य यदि अपने अनुगतों को कुत्तापालन छुड़ाकर गोपालन के लिए प्रतिबद्ध कर लें तो सत्ताओं से कुश्ती लड़ने की अपेक्षाकृत अधिक बड़ी सिद्धि सम्भव है। यह राष्ट्र को संवैधानिक रूप से गोवध रोकने के आन्दोलन में भी अधिक आत्मबल देने वाला होगा।
अब अन्ततः कुछ बातें सोशल मीडिया के योद्धाओं से जिन्हें महान् क्रान्ति का अवसर इस विडम्बना से प्राप्त हो गया है और जो रीच/व्यूज के लोभ में उन्माद बढ़ा रहे हैं।
कृपया ध्यान दें -
पुलिस विभाग में कोई शिखोत्पाटन ब्रांच नहीं है। हाथापाई करते लोगों से आत्मरक्षा, उनको रोकना तथा उपद्रव को शान्त करना पुलिस का दायित्व है। पुलिस कर्मी भी हमारे-आप के घरों से आये हुए लोग हैं, वे किसी बटुक की शिखा उखाड़ने को पुण्यकार्य समझते हों ऐसा नहीं है। यह अपने अधिकारियों की उपस्थिति में बढ़ते उपद्रव को रोकने की एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, जिसे हमने पहले ही आत्मघाती कहा है। इसका प्रोपेगेण्डा बनाकर ब्राह्मण-अवमानना का दुष्प्रचार न करें। शिखा उखाड़ने का रोना रोते हुए लोग जरा अपना ब्रह्मरन्ध्र भी टटोल लें, आपकी शिखा कहाँ है। शिखा का मान रखने वाले अगणित ब्राह्मण इसी प्रयाग में पुलिस सुरक्षा-सेवा प्राप्त कर रहे हैं। यज्ञ कर/करा रहे हैं। कल्पवास कर रहे हैं। प्रवचन कह-सुन रहे हैं। ब्राह्मण वंश के अकेले प्रतिनिधि वही नहीं हैं जिनकी पुलिस से हाथापाई करते हुए चोटी खींची गयी।
ध्यान दें, यह विवाद शंकराचार्य के पद को लेकर नहीं, मेला-प्रबन्धन और उसके उल्लंघन का है, जिसे एक आचार्य ने धार्मिक रंग दे दिया। स्वामी जी को स्नान से नहीं रोका गया। उन्हें रथ/पालकी ले जाने से रोका गया, जैसा कि अन्य आचार्यों को रोका गया और उन्होंने उसका पालन किया।
अन्ततः, माघ-मेले की विधि-व्यवस्था के अवाञ्छित प्रसंग को सनातन धर्म की नूराकुश्ती न बनाएँ। इससे हम सबकी गहरी क्षति है। इसी से धर्मद्रोहियों को अनर्थ का मार्ग मिल रहा है।
स्वामी जी के पक्ष में अवसर की रोटियाँ सेंकते लोग स्वामी जी के नहीं हैं, वे धर्म के भी नहीं हैं, वे बस लाभ के हैं जिन्हें स्वामी जी के चेहरे से वर्तमान सरकार को घेरने का मौका मिल रहा है। वे घेरें इस पर कोई आपत्ति भी नहीं, उनका रोजगार ही यही है। पर इस रूप में नहीं, यह चमड़े के धागे के लिए गाय मारने जैसा है।
स्वामी जी सनातन धर्म के प्रतिनिधि हैं, उनकी इससे इतर अन्य कोई गति नहीं। जिस सरकार को धर्मद्रोही कहकर आप घेर रहे हैं उससे अनेक असहमतियों के बावजूद यह विचार आवश्यक है कि इसको गिराकर कौन सी धार्मिक सरकार आप बना लेंगे।
एक रीतिकालीन दोहा कहते हुए विराम करता हूँ कि -
स्वारथ सुकृत न श्रम बृथा देखु बिहंग बिचारि।
बाज पराये पानि परि तू पंछीनु न मारि॥
किसी प्रकार की अभद्र टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है।
कहि न जाइ का कहिए…
अनुचित क्रोध की परिणति अनर्थ एवं ग्लानि में होती है। अहंकार जितना प्रबल होता है, इस अनर्थ की पहचान उतनी ही देर से होती है। कभी-कभी यह विलम्ब यावज्जीवन भी हो जाता है। तीर्थराज प्रयाग में उपस्थित प्रसंग ऐसा ही एक उदाहरण बनकर उभरा है, जिसका परिणाम अनर्थ एवं पछतावे से अधिक कुछ नहीं होगा। पर, अभी इसके पक्ष-विपक्ष का उत्साह देखते ही बनता है। लग रहा है कि धर्मरक्षा की यही लड़ाई अन्तिम और निर्णायक होने वाली है। बिना भगवान् के अवतार के ही विप्र-धेनु की रक्षा मीडया/सोशल प्लेटफॉर्म के वाग्वीर कर लेंगे। इस विडम्बना का सर्वाधिक क्षोभ सन्त-समाज के हृदय में है। किंकर्त्तव्यमूढता जैसी स्थिति है, क्या कहें और क्या न कहें। ऐसी परिस्थिति में कुछ बिन्दु विनम्रता से यहाँ रखना आवश्यक लग रहा है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द हम सबके आदरणीय हैं। उनके शंकराचार्य होने को लेकर हमारा कोई मतामत नहीं है, किसी भी दूसरे-तीसरे या चौथे व्यक्ति का नहीं होना चाहिए। उसकी एक सम्प्रदायनिष्ठ, परम्पराप्राप्त व्यवस्था है, अतः उसे वहीं से सुनिश्चित होने देना चाहिए। परन्तु, शंकराचार्य पद-प्रतिष्ठित होने से पूर्व वे भारतीय मनुष्य हैं, सुशिक्षित हैं, प्रबुद्ध हैं और इन सबसे बढ़कर साधु हैं, साधु समाज के सम्मानित प्रतिनिध हैं। उन्हें अपने इन सभी परिचयों का मान रखना चाहिए, जिसमें वे बार-बार चूक रहे हैं। उनकी भर्त्सना अपनी ही भर्त्सना है, अपने आप पर ही लानत है, क्योंकि यदि वे शंकराचार्य न भी हों (हालाँकि, ऐसा कोई मत हमारा नहीं है) तब भी उनका अपने स्वरूप के विरुद्ध जाना अत्यन्त दुखद है। यह बहुत ही कठिन है कि स्वामी जी की क्रोधातुर वाणी/व्यवहार का अनुमोदन या प्रतिवाद कैसे किया जाय।
प्रयाग प्रसंग में पुलिस की भूमिका घोर निन्दनीय है। पुलिस कर्मियों का बर्ताव कुण्ठा और चिढ़ से भरा हुआ था। यदि यह उकसावे के कारण था (हालाँकि, यह एक पक्ष मात्र है) तब भी पुलिस ने गैर प्रोफेशनल/ अमानवीय तथा बर्बर कृत्य किया है। स्वामी जी के साथ आये ब्रह्मचारी/सन्न्यासी अपने अभ्यास के अनुरूप अपने आचार्य का साथ दे रहे थे, एक दृष्टि से वे निर्दोष थे। उनके प्रति हिंसक होकर पुलिसबल ने स्वयं को कलंकित ही किया है। यद्यपि किसी आचार्य के सेवादारों से एक स्तर की पारिस्थितिक समझ भी अपेक्षित होती है, जिसका अभाव देखा गया। दुर्भाग्य से स्वामी जी ने भी अपने अनुयायियों को परिस्थिति असामान्य बनाने से वर्जित नहीं किया।
एक और बात ध्यान देने की है, पुलिस के अनुसार स्वामी जी ने अपने दल-बल के साथ आपातकालीन पुल का बैरिअर तोड़ा और बलपूर्वक पुल पार कर गये, यदि यह सच है तो पुलिस ने वहीं अपनी दृढ़ता क्यों नहीं दिखाई। वहीं बैरिअर तोड़ते लोगों को क्यों नहीं रोका गया। उनके संगम स्नान घाट पर पहुँच जाने के बाद (जैसा कि स्नानार्थ गये हमने स्वयं देखा) ऐसी वर्जना के बजाय उनको येन-केन प्रकारेण स्नान करा देना क्या अधिक अच्छा विकल्प नहीं हो सकता था। प्रतिबन्ध तोड़कर आ गये इसलिए अब हम आपको बेइज्जत करेंगे, एक आचार्य के प्रति पुलिस का ऐसा दुराग्रह अनुचित हुआ।
पुनश्च, स्वामी जी जितने राजनैतिक स्वर में अपनी बात कहते हैं वह उनके आचार्यत्व को धूमिल करता है। वे तर्क देते हैं कि नेता धर्म में हस्तक्षेप न करें तो हम राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि नेताओं को भ्रष्ट कहा जाये तो आप भी यही उपाधि अंगीकार कर लेंगे। यह बहुत लचर तर्क है। फिर नेता (सच या झूठ ) जनभावनाओं पर काम करते हैं, धर्म जनभावना का केन्द्रीय तत्त्व है अतः नेताओं का उससे जुड़ना स्वाभाविक है। दूसरी बात यह भी है कि जब आप एकाकी ही धर्मोद्धार का आग्रह प्रकट करते हैं तो ध्वनित होता है कि अन्य सारे आचार्य उन अधर्मों से सहमत हैं, जिनकी प्रतिक्रिया आप दे रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो सत्ता के साथ आपका ऐसा द्वन्द्व क्यों है। आपकी धार्मिक परिष्कार की कार्ययोजना अन्य समान्तर आचार्यो के साथ तालमेल क्यों नहीं बना पाती है।
पूज्य पुरी पीठाधीश्वर, पूज्य शृंगेरी पीठाधीश्वर अथवा आपके गुरुभाई पूज्य द्वारिका पीठाधीश्वर प्रभृति आचार्यों ने आपके इस प्रसंग पर प्रायः मौन रखा या फिर बोलते हुए संयम बरता। इसका ये अर्थ नहीं कि वे भीरु हैं, वे अपने आचार्यत्व का मान रखते हैं। उन्हें ध्यान है कि राष्ट्र आज केवल धर्मशास्त्र के अधीन नहीं है। हमारी सामाजिक योजना एक संविधान के अनुरूप चलती है। उससे अनेक अंशों में हम सहमत-असहमत हो सकते हैं परन्तु उसे अमान्य करना अभी सम्भव नहीं है। आपके मुकदमे, सम्पत्तियों के पंजीकरण तथा आपकी सुरक्षा/प्रोटोकॉल उसी व्यवस्था से निर्धारित होते हैं। अराजकता फैलाना आचार्य का दायित्त्व नहीं हो सकता है।
अपने काषाय, दण्ड, त्रिपुण्ड और आचार्यत्व को भूरिशः लज्जित करते हुए स्वामी जी जिस प्रकार सत्ता के भृतकों/अधिकारियों से भिड़ते हैं वह विचलित करने वाला होता है। और, इसके पीछे जो तर्क हैं वे इतने नये और अनूठे नहीं हैं कि अब इस देश अथवा दुनिया की सारी बुराइयाँ उनके क्रोध से दूर हो जाने वाली हैं।
यह भूलना कठिन है कि गत महाकुम्भ की दारुण त्रासदी के बीच जब देश शोकग्रस्त था स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द जी ने उस दुर्घटना का उत्तरदायी मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ को ठहराते हुए सत्ता का विपक्ष बनकर एक भयानक राजनैतिक उपद्रव प्रकट कर दिया था। इस बार भी अपने बटुकों-सन्न्यासियों को पुलिस से गुत्थमगुत्था होते देखकर भी, पिटते देखकर भी स्वामी जी रथ से नीचे नहीं उतरे। वे बस मीडिया के सम्मुख क्रन्दन करते रहे कि हमने योगी को दोषी कहा था, इसलिए हमसे बदला लिया जा रहा है। कितना हास्यास्पद है कि ये बदला माघमेले की प्लाटिंग में नहीं लिया गया, शिविर की भव्य सुविधाओं में नहीं लिया गया, पुलिस प्रोटोकॉल में नहीं लिया गया। संगम तट पर लाखों की भीड़ के सम्मुख आपसे बदला लेकर सरकार स्वयं को खलनायक बनाएगी, यह बालकोचित तर्क आप किसे देते हैं।
जब अपनी सम्प्रभुता के वेग में स्वामी जी भारत के महामहिम राष्ट्रपति की सीमाएँ रेखांकित करते हैं, तब वे सन्यासी या आचार्य होने से पूर्व अपनी नागरिकता का मान भंग करते हैं, राष्ट्र की सम्प्रभुता को तिरस्कृत करते हैं। तब पूज्य स्वामी जी भूल जाते हैं कि उनका विद्यालयी स्वाध्याय, उनकी शास्त्री-आचार्यादि की उपाधियाँ, उनके मठ की रजिस्ट्री, उनका वैभव, सोना-चाँदी और वे सभी उपादान जो स्वामी जी को रथ/पालकी अथवा सोने-चाँदी के सिंहासन पर आरूढ़ करते हैं, उन सबका अस्तित्व राष्ट्र की सम्प्रभुता से संरक्षित होता है। वही राष्ट्र जिसका प्रतिनिधित्व राष्ट्रपति करते हैं।
भारत की एक विशिष्ट आध्यात्मिक परम्परा के सर्वमान्य पीठाधीश्वर तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री को हुमायूँ का बेटा या औरंगजेब कहते हुए स्वामी जी गुरु गोरक्षनाथ, गोरक्षपीठ की पुण्यपरम्परा तथा गोरक्ष-परम्परा के धार्मिक-सामाजिक अवदान की न केवल अवमानना करते हैं, बल्कि वे अपने वेष/भाषा की मर्यादा भी भूल जाते हैं।
क्रोध सदा बल का चिह्न नहीं होता। भगवान् परशुराम को अपने शिष्य से पराजित होना पड़ा था। श्रीराम से तो जगत् बिदित है ही। यह बार-बार फरसा दिखाना अशान्ति को जन्म देता है। अपने दुराग्रहों से सत्ता को खलनायक बताते हुए योगी को औरंगजेब कहने वाले स्वामी जी लाठियों से पिटवाने वाले नेता को अखिलेश ‘जी’ कहते हैं। चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुँचाने की यह तकनीक धार्मिक विश्वासों को अपमानित करने के मार्ग से आगे बढ़ती है, जिसका एक उदाहरण बटुकों की प्रताड़ना के रूप में सामने आया है। विक्टिम बनकर जनता में योगी सरकार के प्रति आक्रोश भरने का यह खेल आत्मघाती है। एक सन्त का यह मार्ग कदापि नहीं होना चाहिए।
गोरक्षा का प्रश्न इस देश में नया नहीं है। पूज्य धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज इस आन्दोलन का नेतृत्व कर चुके हैं। वहाँ भी अनियन्त्रित हुए द्वन्द्व तथा सत्ता के साथ संघर्ष के कारण दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम आये और उसकी आधी शती बीत जाने के बाद भी संघर्ष शेष ही है। थोड़ा भी देशकाल का बोध जिन्हें है वे जानते हैं कि गोरक्षा का संवैधानिक विषय भारत के लिए जितना मौलिक एवं आवश्यक है, यह उतना ही जटिल भी है। गोरक्षा-कानून के अपने आश्वासन को पूरा न कर पाने की काँग्रेस की विफलता से क्षुब्ध होकर भारत की नागरिकता से त्यागपत्र देने वाले पूज्य ब्रह्मचारी गुरूजी के आशीर्वाद का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उनके अनेक संस्मरण इस विषय पर सुने हैं। तब नेपाल हिन्दू राष्ट्र था, उनके पास विकल्प था आज वह भी नहीं है।
प्रसंगवश यह भी कहना आवश्यक है कि, गोरक्षा केवल हत्यारों से लड़ाई करना भर नहीं है। जो गाय का उत्पाद उपयोग करते हैं और गोपालन नहीं करते वे वास्तविक गो-हत्यारे हैं। आचार्य यदि अपने अनुगतों को कुत्तापालन छुड़ाकर गोपालन के लिए प्रतिबद्ध कर लें तो सत्ताओं से कुश्ती लड़ने की अपेक्षाकृत अधिक बड़ी सिद्धि सम्भव है। यह राष्ट्र को संवैधानिक रूप से गोवध रोकने के आन्दोलन में भी अधिक आत्मबल देने वाला होगा।
अब अन्ततः कुछ बातें सोशल मीडिया के योद्धाओं से जिन्हें महान् क्रान्ति का अवसर इस विडम्बना से प्राप्त हो गया है और जो रीच/व्यूज के लोभ में उन्माद बढ़ा रहे हैं।
कृपया ध्यान दें -
पुलिस विभाग में कोई शिखोत्पाटन ब्रांच नहीं है। हाथापाई करते लोगों से आत्मरक्षा, उनको रोकना तथा उपद्रव को शान्त करना पुलिस का दायित्व है। पुलिस कर्मी भी हमारे-आप के घरों से आये हुए लोग हैं, वे किसी बटुक की शिखा उखाड़ने को पुण्यकार्य समझते हों ऐसा नहीं है। यह अपने अधिकारियों की उपस्थिति में बढ़ते उपद्रव को रोकने की एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, जिसे हमने पहले ही आत्मघाती कहा है। इसका प्रोपेगेण्डा बनाकर ब्राह्मण-अवमानना का दुष्प्रचार न करें। शिखा उखाड़ने का रोना रोते हुए लोग जरा अपना ब्रह्मरन्ध्र भी टटोल लें, आपकी शिखा कहाँ है। शिखा का मान रखने वाले अगणित ब्राह्मण इसी प्रयाग में पुलिस सुरक्षा-सेवा प्राप्त कर रहे हैं। यज्ञ कर/करा रहे हैं। कल्पवास कर रहे हैं। प्रवचन कह-सुन रहे हैं। ब्राह्मण वंश के अकेले प्रतिनिधि वही नहीं हैं जिनकी पुलिस से हाथापाई करते हुए चोटी खींची गयी।
ध्यान दें, यह विवाद शंकराचार्य के पद को लेकर नहीं, मेला-प्रबन्धन और उसके उल्लंघन का है, जिसे एक आचार्य ने धार्मिक रंग दे दिया। स्वामी जी को स्नान से नहीं रोका गया। उन्हें रथ/पालकी ले जाने से रोका गया, जैसा कि अन्य आचार्यों को रोका गया और उन्होंने उसका पालन किया।
अन्ततः, माघ-मेले की विधि-व्यवस्था के अवाञ्छित प्रसंग को सनातन धर्म की नूराकुश्ती न बनाएँ। इससे हम सबकी गहरी क्षति है। इसी से धर्मद्रोहियों को अनर्थ का मार्ग मिल रहा है।
स्वामी जी के पक्ष में अवसर की रोटियाँ सेंकते लोग स्वामी जी के नहीं हैं, वे धर्म के भी नहीं हैं, वे बस लाभ के हैं जिन्हें स्वामी जी के चेहरे से वर्तमान सरकार को घेरने का मौका मिल रहा है। वे घेरें इस पर कोई आपत्ति भी नहीं, उनका रोजगार ही यही है। पर इस रूप में नहीं, यह चमड़े के धागे के लिए गाय मारने जैसा है।
स्वामी जी सनातन धर्म के प्रतिनिधि हैं, उनकी इससे इतर अन्य कोई गति नहीं। जिस सरकार को धर्मद्रोही कहकर आप घेर रहे हैं उससे अनेक असहमतियों के बावजूद यह विचार आवश्यक है कि इसको गिराकर कौन सी धार्मिक सरकार आप बना लेंगे।
एक रीतिकालीन दोहा कहते हुए विराम करता हूँ कि -
स्वारथ सुकृत न श्रम बृथा देखु बिहंग बिचारि।
बाज पराये पानि परि तू पंछीनु न मारि॥
किसी प्रकार की अभद्र टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है।
साभार....
कहि न जाइ का कहिए…
अनुचित क्रोध की परिणति अनर्थ एवं ग्लानि में होती है। अहंकार जितना प्रबल होता है, इस अनर्थ की पहचान उतनी ही देर से होती है। कभी-कभी यह विलम्ब यावज्जीवन भी हो जाता है। तीर्थराज प्रयाग में उपस्थित प्रसंग ऐसा ही एक उदाहरण बनकर उभरा है, जिसका परिणाम अनर्थ एवं पछतावे से अधिक कुछ नहीं होगा। पर, अभी इसके पक्ष-विपक्ष का उत्साह देखते ही बनता है। लग रहा है कि धर्मरक्षा की यही लड़ाई अन्तिम और निर्णायक होने वाली है। बिना भगवान् के अवतार के ही विप्र-धेनु की रक्षा मीडया/सोशल प्लेटफॉर्म के वाग्वीर कर लेंगे। इस विडम्बना का सर्वाधिक क्षोभ सन्त-समाज के हृदय में है। किंकर्त्तव्यमूढता जैसी स्थिति है, क्या कहें और क्या न कहें। ऐसी परिस्थिति में कुछ बिन्दु विनम्रता से यहाँ रखना आवश्यक लग रहा है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द हम सबके आदरणीय हैं। उनके शंकराचार्य होने को लेकर हमारा कोई मतामत नहीं है, किसी भी दूसरे-तीसरे या चौथे व्यक्ति का नहीं होना चाहिए। उसकी एक सम्प्रदायनिष्ठ, परम्पराप्राप्त व्यवस्था है, अतः उसे वहीं से सुनिश्चित होने देना चाहिए। परन्तु, शंकराचार्य पद-प्रतिष्ठित होने से पूर्व वे भारतीय मनुष्य हैं, सुशिक्षित हैं, प्रबुद्ध हैं और इन सबसे बढ़कर साधु हैं, साधु समाज के सम्मानित प्रतिनिध हैं। उन्हें अपने इन सभी परिचयों का मान रखना चाहिए, जिसमें वे बार-बार चूक रहे हैं। उनकी भर्त्सना अपनी ही भर्त्सना है, अपने आप पर ही लानत है, क्योंकि यदि वे शंकराचार्य न भी हों (हालाँकि, ऐसा कोई मत हमारा नहीं है) तब भी उनका अपने स्वरूप के विरुद्ध जाना अत्यन्त दुखद है। यह बहुत ही कठिन है कि स्वामी जी की क्रोधातुर वाणी/व्यवहार का अनुमोदन या प्रतिवाद कैसे किया जाय।
प्रयाग प्रसंग में पुलिस की भूमिका घोर निन्दनीय है। पुलिस कर्मियों का बर्ताव कुण्ठा और चिढ़ से भरा हुआ था। यदि यह उकसावे के कारण था (हालाँकि, यह एक पक्ष मात्र है) तब भी पुलिस ने गैर प्रोफेशनल/ अमानवीय तथा बर्बर कृत्य किया है। स्वामी जी के साथ आये ब्रह्मचारी/सन्न्यासी अपने अभ्यास के अनुरूप अपने आचार्य का साथ दे रहे थे, एक दृष्टि से वे निर्दोष थे। उनके प्रति हिंसक होकर पुलिसबल ने स्वयं को कलंकित ही किया है। यद्यपि किसी आचार्य के सेवादारों से एक स्तर की पारिस्थितिक समझ भी अपेक्षित होती है, जिसका अभाव देखा गया। दुर्भाग्य से स्वामी जी ने भी अपने अनुयायियों को परिस्थिति असामान्य बनाने से वर्जित नहीं किया।
एक और बात ध्यान देने की है, पुलिस के अनुसार स्वामी जी ने अपने दल-बल के साथ आपातकालीन पुल का बैरिअर तोड़ा और बलपूर्वक पुल पार कर गये, यदि यह सच है तो पुलिस ने वहीं अपनी दृढ़ता क्यों नहीं दिखाई। वहीं बैरिअर तोड़ते लोगों को क्यों नहीं रोका गया। उनके संगम स्नान घाट पर पहुँच जाने के बाद (जैसा कि स्नानार्थ गये हमने स्वयं देखा) ऐसी वर्जना के बजाय उनको येन-केन प्रकारेण स्नान करा देना क्या अधिक अच्छा विकल्प नहीं हो सकता था। प्रतिबन्ध तोड़कर आ गये इसलिए अब हम आपको बेइज्जत करेंगे, एक आचार्य के प्रति पुलिस का ऐसा दुराग्रह अनुचित हुआ।
पुनश्च, स्वामी जी जितने राजनैतिक स्वर में अपनी बात कहते हैं वह उनके आचार्यत्व को धूमिल करता है। वे तर्क देते हैं कि नेता धर्म में हस्तक्षेप न करें तो हम राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि नेताओं को भ्रष्ट कहा जाये तो आप भी यही उपाधि अंगीकार कर लेंगे। यह बहुत लचर तर्क है। फिर नेता (सच या झूठ ) जनभावनाओं पर काम करते हैं, धर्म जनभावना का केन्द्रीय तत्त्व है अतः नेताओं का उससे जुड़ना स्वाभाविक है। दूसरी बात यह भी है कि जब आप एकाकी ही धर्मोद्धार का आग्रह प्रकट करते हैं तो ध्वनित होता है कि अन्य सारे आचार्य उन अधर्मों से सहमत हैं, जिनकी प्रतिक्रिया आप दे रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो सत्ता के साथ आपका ऐसा द्वन्द्व क्यों है। आपकी धार्मिक परिष्कार की कार्ययोजना अन्य समान्तर आचार्यो के साथ तालमेल क्यों नहीं बना पाती है।
पूज्य पुरी पीठाधीश्वर, पूज्य शृंगेरी पीठाधीश्वर अथवा आपके गुरुभाई पूज्य द्वारिका पीठाधीश्वर प्रभृति आचार्यों ने आपके इस प्रसंग पर प्रायः मौन रखा या फिर बोलते हुए संयम बरता। इसका ये अर्थ नहीं कि वे भीरु हैं, वे अपने आचार्यत्व का मान रखते हैं। उन्हें ध्यान है कि राष्ट्र आज केवल धर्मशास्त्र के अधीन नहीं है। हमारी सामाजिक योजना एक संविधान के अनुरूप चलती है। उससे अनेक अंशों में हम सहमत-असहमत हो सकते हैं परन्तु उसे अमान्य करना अभी सम्भव नहीं है। आपके मुकदमे, सम्पत्तियों के पंजीकरण तथा आपकी सुरक्षा/प्रोटोकॉल उसी व्यवस्था से निर्धारित होते हैं। अराजकता फैलाना आचार्य का दायित्त्व नहीं हो सकता है।
अपने काषाय, दण्ड, त्रिपुण्ड और आचार्यत्व को भूरिशः लज्जित करते हुए स्वामी जी जिस प्रकार सत्ता के भृतकों/अधिकारियों से भिड़ते हैं वह विचलित करने वाला होता है। और, इसके पीछे जो तर्क हैं वे इतने नये और अनूठे नहीं हैं कि अब इस देश अथवा दुनिया की सारी बुराइयाँ उनके क्रोध से दूर हो जाने वाली हैं।
यह भूलना कठिन है कि गत महाकुम्भ की दारुण त्रासदी के बीच जब देश शोकग्रस्त था स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द जी ने उस दुर्घटना का उत्तरदायी मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ को ठहराते हुए सत्ता का विपक्ष बनकर एक भयानक राजनैतिक उपद्रव प्रकट कर दिया था। इस बार भी अपने बटुकों-सन्न्यासियों को पुलिस से गुत्थमगुत्था होते देखकर भी, पिटते देखकर भी स्वामी जी रथ से नीचे नहीं उतरे। वे बस मीडिया के सम्मुख क्रन्दन करते रहे कि हमने योगी को दोषी कहा था, इसलिए हमसे बदला लिया जा रहा है। कितना हास्यास्पद है कि ये बदला माघमेले की प्लाटिंग में नहीं लिया गया, शिविर की भव्य सुविधाओं में नहीं लिया गया, पुलिस प्रोटोकॉल में नहीं लिया गया। संगम तट पर लाखों की भीड़ के सम्मुख आपसे बदला लेकर सरकार स्वयं को खलनायक बनाएगी, यह बालकोचित तर्क आप किसे देते हैं।
जब अपनी सम्प्रभुता के वेग में स्वामी जी भारत के महामहिम राष्ट्रपति की सीमाएँ रेखांकित करते हैं, तब वे सन्यासी या आचार्य होने से पूर्व अपनी नागरिकता का मान भंग करते हैं, राष्ट्र की सम्प्रभुता को तिरस्कृत करते हैं। तब पूज्य स्वामी जी भूल जाते हैं कि उनका विद्यालयी स्वाध्याय, उनकी शास्त्री-आचार्यादि की उपाधियाँ, उनके मठ की रजिस्ट्री, उनका वैभव, सोना-चाँदी और वे सभी उपादान जो स्वामी जी को रथ/पालकी अथवा सोने-चाँदी के सिंहासन पर आरूढ़ करते हैं, उन सबका अस्तित्व राष्ट्र की सम्प्रभुता से संरक्षित होता है। वही राष्ट्र जिसका प्रतिनिधित्व राष्ट्रपति करते हैं।
भारत की एक विशिष्ट आध्यात्मिक परम्परा के सर्वमान्य पीठाधीश्वर तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री को हुमायूँ का बेटा या औरंगजेब कहते हुए स्वामी जी गुरु गोरक्षनाथ, गोरक्षपीठ की पुण्यपरम्परा तथा गोरक्ष-परम्परा के धार्मिक-सामाजिक अवदान की न केवल अवमानना करते हैं, बल्कि वे अपने वेष/भाषा की मर्यादा भी भूल जाते हैं।
क्रोध सदा बल का चिह्न नहीं होता। भगवान् परशुराम को अपने शिष्य से पराजित होना पड़ा था। श्रीराम से तो जगत् बिदित है ही। यह बार-बार फरसा दिखाना अशान्ति को जन्म देता है। अपने दुराग्रहों से सत्ता को खलनायक बताते हुए योगी को औरंगजेब कहने वाले स्वामी जी लाठियों से पिटवाने वाले नेता को अखिलेश ‘जी’ कहते हैं। चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुँचाने की यह तकनीक धार्मिक विश्वासों को अपमानित करने के मार्ग से आगे बढ़ती है, जिसका एक उदाहरण बटुकों की प्रताड़ना के रूप में सामने आया है। विक्टिम बनकर जनता में योगी सरकार के प्रति आक्रोश भरने का यह खेल आत्मघाती है। एक सन्त का यह मार्ग कदापि नहीं होना चाहिए।
गोरक्षा का प्रश्न इस देश में नया नहीं है। पूज्य धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज इस आन्दोलन का नेतृत्व कर चुके हैं। वहाँ भी अनियन्त्रित हुए द्वन्द्व तथा सत्ता के साथ संघर्ष के कारण दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम आये और उसकी आधी शती बीत जाने के बाद भी संघर्ष शेष ही है। थोड़ा भी देशकाल का बोध जिन्हें है वे जानते हैं कि गोरक्षा का संवैधानिक विषय भारत के लिए जितना मौलिक एवं आवश्यक है, यह उतना ही जटिल भी है। गोरक्षा-कानून के अपने आश्वासन को पूरा न कर पाने की काँग्रेस की विफलता से क्षुब्ध होकर भारत की नागरिकता से त्यागपत्र देने वाले पूज्य ब्रह्मचारी गुरूजी के आशीर्वाद का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उनके अनेक संस्मरण इस विषय पर सुने हैं। तब नेपाल हिन्दू राष्ट्र था, उनके पास विकल्प था आज वह भी नहीं है।
प्रसंगवश यह भी कहना आवश्यक है कि, गोरक्षा केवल हत्यारों से लड़ाई करना भर नहीं है। जो गाय का उत्पाद उपयोग करते हैं और गोपालन नहीं करते वे वास्तविक गो-हत्यारे हैं। आचार्य यदि अपने अनुगतों को कुत्तापालन छुड़ाकर गोपालन के लिए प्रतिबद्ध कर लें तो सत्ताओं से कुश्ती लड़ने की अपेक्षाकृत अधिक बड़ी सिद्धि सम्भव है। यह राष्ट्र को संवैधानिक रूप से गोवध रोकने के आन्दोलन में भी अधिक आत्मबल देने वाला होगा।
अब अन्ततः कुछ बातें सोशल मीडिया के योद्धाओं से जिन्हें महान् क्रान्ति का अवसर इस विडम्बना से प्राप्त हो गया है और जो रीच/व्यूज के लोभ में उन्माद बढ़ा रहे हैं।
कृपया ध्यान दें -
पुलिस विभाग में कोई शिखोत्पाटन ब्रांच नहीं है। हाथापाई करते लोगों से आत्मरक्षा, उनको रोकना तथा उपद्रव को शान्त करना पुलिस का दायित्व है। पुलिस कर्मी भी हमारे-आप के घरों से आये हुए लोग हैं, वे किसी बटुक की शिखा उखाड़ने को पुण्यकार्य समझते हों ऐसा नहीं है। यह अपने अधिकारियों की उपस्थिति में बढ़ते उपद्रव को रोकने की एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, जिसे हमने पहले ही आत्मघाती कहा है। इसका प्रोपेगेण्डा बनाकर ब्राह्मण-अवमानना का दुष्प्रचार न करें। शिखा उखाड़ने का रोना रोते हुए लोग जरा अपना ब्रह्मरन्ध्र भी टटोल लें, आपकी शिखा कहाँ है। शिखा का मान रखने वाले अगणित ब्राह्मण इसी प्रयाग में पुलिस सुरक्षा-सेवा प्राप्त कर रहे हैं। यज्ञ कर/करा रहे हैं। कल्पवास कर रहे हैं। प्रवचन कह-सुन रहे हैं। ब्राह्मण वंश के अकेले प्रतिनिधि वही नहीं हैं जिनकी पुलिस से हाथापाई करते हुए चोटी खींची गयी।
ध्यान दें, यह विवाद शंकराचार्य के पद को लेकर नहीं, मेला-प्रबन्धन और उसके उल्लंघन का है, जिसे एक आचार्य ने धार्मिक रंग दे दिया। स्वामी जी को स्नान से नहीं रोका गया। उन्हें रथ/पालकी ले जाने से रोका गया, जैसा कि अन्य आचार्यों को रोका गया और उन्होंने उसका पालन किया।
अन्ततः, माघ-मेले की विधि-व्यवस्था के अवाञ्छित प्रसंग को सनातन धर्म की नूराकुश्ती न बनाएँ। इससे हम सबकी गहरी क्षति है। इसी से धर्मद्रोहियों को अनर्थ का मार्ग मिल रहा है।
स्वामी जी के पक्ष में अवसर की रोटियाँ सेंकते लोग स्वामी जी के नहीं हैं, वे धर्म के भी नहीं हैं, वे बस लाभ के हैं जिन्हें स्वामी जी के चेहरे से वर्तमान सरकार को घेरने का मौका मिल रहा है। वे घेरें इस पर कोई आपत्ति भी नहीं, उनका रोजगार ही यही है। पर इस रूप में नहीं, यह चमड़े के धागे के लिए गाय मारने जैसा है।
स्वामी जी सनातन धर्म के प्रतिनिधि हैं, उनकी इससे इतर अन्य कोई गति नहीं। जिस सरकार को धर्मद्रोही कहकर आप घेर रहे हैं उससे अनेक असहमतियों के बावजूद यह विचार आवश्यक है कि इसको गिराकर कौन सी धार्मिक सरकार आप बना लेंगे।
एक रीतिकालीन दोहा कहते हुए विराम करता हूँ कि -
स्वारथ सुकृत न श्रम बृथा देखु बिहंग बिचारि।
बाज पराये पानि परि तू पंछीनु न मारि॥
किसी प्रकार की अभद्र टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है।
0 Comments
0 Shares
51 Views
0 Reviews